अमरोहा (तहरीम वाहिद) – पिछले वर्ष दिसम्बर माह मे चीन मे जन्मी कोरोना महामारी ने देखते ही देखते दुनिया के कई बड़े देशों को अपनी चपेट मे ले लिया ।परंतु भारत सरकार में इसे गम्भीरता से नही लिया इसी कारण कोरोना महामारी का भारत में प्रवेश हो गया।
सर्वाधिक चिंता का विषय ये है जब कोरोना महामारी की चपेट में आए संक्रमित मरीज़ों की संख्या मात्र गिनती मे थी तब सम्पूर्ण लाॅक डाउन की घोषणा कर दी गई ।लगभग 3 माह के लाॅक डाउन के बाद जिस प्रकार शराब की दुकानें (मधुशालाओं) को खोल कर कोरोना महामारी को बढ़ावा दिया गया वो दुर्भाग्यपूर्ण था।
अब ज़रा मंथन करे शराब की दुकानें खुलने से फायदा किस का है जनता का या पूंजी पतियों का जब सरकार की जिम्मेदारी थी कि लोगों तक मदद पहुंचाए तो मदद न पहुंचने के कारण भारी संख्या में प्रवासी मजदूरों का पलायन शुरू हो गया ।सरकारी अंकडे कुछ भी हो परंतु यदि समाजसेवियो ने पलायन कर्ताओ को राहत सामग्री न पहुचाई होती तो कोरोना से अधिक मरने वालो की संख्या भुखमरी से होती। धीरे-धीरे समय बीत गया परंतु कोरोना अपने पैर भारत में दिन प्रतिदिन पसारता रहा ।
शासन मे बैठे जि़म्मेदार मात्र मूक दर्शक की भांति देखते रहे।आज भारत में कोरोना की वो भयावह हालत है कि संक्रमित मरीजों की संख्या लाखों में पहुँच चुकी है परंतु शासन द्वारा अब तक कोई गम्भीर फैसला कोरोना महामारी को लेकर नही हुआ।
अगर स्वास्थ्य सेवाएं इसी गति से कार्य करती रहीं और लोग इसी प्रकार जगह जगह एकत्रित होते रहें तो जल्द ही ये लाखों के अंकडे करोड़ों में होंगे।
आज उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कोरोना की पाजिटिव रिपोर्ट की संख्या 650 से अधिक बताई जा रही है। परंतु न सड़कों पर आवागमन बंद है न बाजारों में भीड़। ऐसे मे शासन की उदासीनता एवम् प्रसाशकीय अधिकारीयों की दुर्लक्षता हमारे राज्य के लिए एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।
संपूर्ण राज्य में खासकर राजधानी लखनऊ में 5 अगस्त को राम जन्मभूमि भूमि पूजन के अवसर पर लोगों ने शोसल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उडाई, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी व मुख्यमंत्री योगीजी ने 3 महिने पहले ही दिवाली जैसा माहौल बना दिया। जहां राष्ट्र कोरोना संक्रमित मरीज़ों के उपचार हेतु सुविधाओं की पुर्तता करना चाहिए था वहां देश के मुखिया मंदिर निर्माण को प्राथमिकता देते नज़र आए।
कोई उन कोरोना संक्रमित मरीज़ों के परिजनों से पूछे तो पता चलेगा कि वास्तव स्थिति क्या है। मानवता की दृष्टि से देखा जाए तो गरीब ही परेशान नजर आता है।
अमिताभ बच्चन जैसे पुंजीपति संक्रमित होने के बाद अच्छे होकर अपने घर चले जाते हैं परन्तु गरीब संक्रमण से लढते लढते श्मशानघाट/कब्रिस्तान पहुंच जाते हैं।







