हिन्दुस्तान के मशहूरो-मारूफ शायर जनाब राहत इंदौरी साहब का उम्र के ७०वें साल में पुर-मलाल इंतकाल।

कोविद-19, कोरोना महामारी से संक्रमित हुए थे राहत इंदौरी साहब।
लखनऊ(उत्तर प्रदेश) (सय्यद गुलाम हुसैन) – भारत के मशहूर शायर जनाब राहत इंदौरी साहब का उनके उम्र के ७०वें साल में इंतकाल हो गया, उनके बेटे सतलज के अनुसार राहत साहब अस्पताल के ICU में भर्ती कराया गया जो एक Covid स्पेशल अस्पताल है। लेकिन संक्रमण बढ़ने के कारण उनका इंतकाल हो गया।
राहत साहब ने कल रात ट्वीट किया था कि ‘कोविड-19 कोरोना महामारी के शुरुआती लक्षण दिखने पर कल मेरा कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है। ऑरबिंदो हॉस्पिटल में एडमिट हूं, दुआ कीजिए जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं। एक और इल्तेजा है, मुझे या घर के लोगों को फोन न करें, मेरी ख़ैरियत ट्विटर और फेसबुक पर आपको मिलती रहेगी।
अस्पताल के चेस्ट विभाग के प्रमुख डॉ. रवि डोसी ने बताया कि राहत साहब के दोनों फेफड़ों में निमोनिया मिला है। सांस लेने में तकलीफ के चलते उन्हें ICU में रखा गया था और रात में ही ऑक्सीजन दी जा रही थी।
उनके के बेटे और युवा शायर सतलज राहत ने बताया कि Covid-19 के प्रकोप के कारण उनके पिता पिछले कई महीने से घर में ही थे। राहत साहब को पिछले पांच दिन से बेचैनी महसूस हो रही थी और डॉक्टरों की सलाह पर जब उनके फेफड़ों का एक्स-रे कराया गया, तो इनमें निमोनिया की पुष्टि हुई। बाद में जांच में वह कोरोना वायरस से भी संक्रमित पाये गये थे।
सतलज के अनुसार ने उनके पिता हृदय रोग और मधुमेह सरीखी पुरानी बीमारियों से पहले ही जूझ रहे थे।
जनाब राहत इंदौरी साहब का जन्म इंदौर में तारीख १ जनवरी १९५० में हुआ। कपड़ा मिल के कर्मचारी रफ्अतुल्लाह कुरैशी और मकबूलुन्निसा बेगम के वे चौथी औलाद थी। उनकी शुरुआती पढ़ाई नूतन स्कूल इंदौर में हुई। उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से १९७३ में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और १९७५ में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए(MA) किया। १९८५ में मध्य प्रदेश के मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
ज़ाती जिंदगी के बारे में अगर कहा जाए तो राहत साहब की दो बड़ी बहनें थीं जिनके नाम तहज़ीब और तक़रीब थे,एक बड़े भाई अकील और फिर एक छोटे भाई आदिल रहे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और राहत साहब को शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। उन्होंने अपने ही शहर में एक साइन-चित्रकार के रूप में १० साल से भी कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। चित्रकारी उनकी रुचि के क्षेत्रों में से एक थी और बहुत जल्द ही बहुत नाम व शोहरत हासिल किया था। वह कुछ ही समय में इंदौर के मशहूर साइनबोर्ड चित्रकार बन गए। क्योंकि उनकी प्रतिभा, असाधारण डिज़ाइन कौशल, शानदार रंग भावना और कल्पना की है कि और इसलिए वह प्रसिद्ध भी हैं। यह भी एक दौर था कि ग्राहकों को उनके द्वारा चित्रित बोर्डों को पाने के लिए महीनों का इंतजार करना भी स्वीकार था। यहाँ की दुकानों के लिए किया गया पेंट कई साइनबोर्ड्स पर इंदौर में आज भी देखा जा सकता है।
राहत इंदौरी साहब का प्रदर्शन अगर देखें तो
डॉ. राहत इंदोरी साहब लगातार ४५ सालों से मोशायरा और कवी सम्मेलन में प्रदर्शन कर रहे थे। कविता पढ़ने के लिए उन्होंने व्यापक रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यात्रा की है उन्होंने भारत के लगभग सभी जिलों में कवि संप्रदायों में भाग लिया है और कई बार अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, मॉरीशस, केएसए, कुवैत, बहरीन, ओमान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि से भी यात्रा की है।
राहत इंदौरी साहब की फिल्मी गीत दर्जनों फ़िल्मों में लिखे। जैसे
“आज हमने दिल का हर किस्सा (फ़िल्म- सर)
तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है (फ़िल्म- खुद्दार)
खत लिखना हमें खत लिखना (फ़िल्म- खुद्दार)
रात क्या मांगे एक सितारा (फ़िल्म- खुद्दार)
दिल को हज़ार बार रोका (फ़िल्म- मर्डर)
एम बोले तो मैं मास्टर (फ़िल्म- मुन्नाभाई एमबीबीएस)
धुंआ धुंआ (फ़िल्म- मिशन कश्मीर)
ये रिश्ता क्या कहलाता है (फ़िल्म- मीनाक्षी)
चोरी-चोरी जब नज़रें मिलीं (फ़िल्म- करीब)
देखो-देखो जानम हम दिल (फ़िल्म- इश्क़)
नींद चुरायी मेरी (फ़िल्म- इश्क़)
मुर्शिदा (फ़िल्म – बेगम जान)
प्रसिद्ध ग़ज़ल
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
राहत इंदौरी साहब ने १९७२ में,सिर्फ १९ वर्ष की उम्र में अपनी पहली कविता को पढा।, स्कूल और कॉलेज के दौरान वह काफी प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे, जहां वह हॉकी और फुटबॉल टीम के कप्तान थे।
१९७३ में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद,अगले दस वर्ष उन्होंने फूज़ूल में बिताए क्योंकि वह यह निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि जीवन में क्या किया जाए। और यहां-वहां घूमते रहते थे। हालांकि, अपने दोस्तों से प्रोत्साहित होने के बाद, उन्होंने उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर करने का मन बनाया और जिसे स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण किया।
राहत इंदौरी साहब को उन्हें देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर में पढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव मिला था। चूंकि शिक्षण के लिए पीएच.डी. की डिग्री अनिवार्य थी, इसलिए उन्होंने उर्दू साहित्य में पीएच.डी. की और उर्दू साहित्य के प्रोफेसर के रूप में वहां अध्यापन करना शुरू कर दिया। उन्होंने वहां १६ वर्षों तक शिक्षण किया। इसके बाद उनके मार्गदर्शन में कई छात्रों ने पीएचडी की।आप कविता क्षेत्र में आने से पहले, वह एक चित्रकार बनना चाहते थे और जिसके लिए उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर पेंटिंग करना भी शुरू कर दिया था। इस दौरान वह बॉलीवुड फिल्म के पोस्टर और बैनर को चित्रित करते थे। यही नहीं, वह आज भी पुस्तकों के कवर को डिजाइन करते हैं। उनके गीतों को ११ से अधिक ब्लॉकबस्टर बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल किया गया। जिसमें से मुन्ना भाई एमबीबीएस एक है। मशहूर पंक्तियों मे
जनाज़े पर मेरे लिख देना यारो
मुहब्बत करने वाला जा रहा है।
मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता,
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी।
मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना,
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना।
हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते !
अफ़वाह थी कि मेरी तबियत खराब है
लोगों ने पूछ पूछ के बीमार कर दिया
दो गज़ सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है
ऐ मौत तूने मुझे ज़मीनदार कर दिया
राहत इंदौरी का लखनऊ से पुराना नाता रहा उनके निधन पर संपूर्ण देश व दुनिया ने लोंगों ने दुख प्रकट किया।
साहित्य व अदब की दुनिया से एक कीमती सितारा चला गया
राहत साहब के जाने से अदबी दुनिया एक नायाब नगीना सुपुर्देखाक़ हो गया उनका जाना अत्यधिक दुखद: है।
मरहूम राहत साहब को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने महबूब मुहम्मदुर्रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम की शफाअत नसीब करे और अहले ख़ानदान को सब्र ए ज़मील अता करे। आमीन या रब्बुल आलेमीन ।

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