सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं हो सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के बैक टू बैक दो फैसले कफील खान की तुरंत रिहाई और प्रशांत भूषण को ₹1 मुचलके पर छोड़ने का फैसला दोनों सराहनीय

लखनऊ (उत्तर प्रदेश उपसंपादक सय्यद गुलाम हुसैन) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डॉक्टर कफील खान को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए हैं. गोरखपुर के बी. आर. डी. मेडिकल कॉलेज के प्रवक्ता और बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफील खान को CAA, NRC और NPR के विरोध के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 13 दिसंबर 2019 को कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था. कोर्ट ने NSA के तहत डॉक्टर कफील को हिरासत में लेने और हिरासत की अवधि को बढ़ाए जाने को गैरकानूनी करार दिया.
रासुका के तहत जेल में बंद डॉक्टर कफ़ील ख़ान को रिहा करने का आदेश इलाहबाद हाईकोर्ट ने दे दिया है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि डॉक्टर कफील खान पर एनएसए के तहत कार्रवाई गैरकानूनी है। अलीगढ़ डीएम की तरफ से एनएसए की कार्रवाई आदेश गैरकानूनी है। कफील खान को हिरासत में लेने की अवधि का विस्तार भी अवैध है।
ज़रा सोचिए कफ़ील ख़ान का परिवार पढ़ा लिखा है, सक्षम है, साधन संपन्न है, इसके बावजूद एक बेगुनाह को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिये सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट तक जाना पड़ा, छः महीने तक जेल में रहना पड़ा। सोचिए जो परिवार सक्षम नहीं हैं, उन पर यह सिस्टम क्या क्या सितम नहीं करता होगा? एक बेगुनाह को छ महीने तक जेल में रखा गया, क्या यह अपने नागरिकों पर अत्याचार नहीं है?
बेगुनाह को जेल में रखने वाले अधिकारियों, और अपना फर्ज़ भूलकर ‘ऊपर’ के आदेश का पालन करने वाले अफसर क्या नागरिकों पर ज़ुल्म नहीं कर रहे हैं? ऐसे अफसरों के ख़िलाफ कब कार्रावाई की जाएगी? क्या अदालतों को नहीं चाहिए कि नागरिकों को झूठे मामलों में फंसाकर जेल में रखने वाले अफसरों, सरकार के लोगों के खिलाफ भी सख्त आदेश पारित न किए जाने चाहिए ? जितने दिन भी कोई निर्दोष नागरिक जेल में रहा है, उसका मुआवज़ा उसे जेल भेजने वाले अफसरों, और सरकार के लोगों से न वसूला जाए? ।
सिर्फ इतने से खुश नहीं हुआ जा सकता कि नागरिक बेगुनाह बाइज्ज़त रिहा कर दिया गया, बल्कि सवाल उससे आगे का है। सवाल यह है कि बेगुनाह होते हुए भी जेल में क्यों डाला गया? हाल ही में आई 2019 की नेशलन क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बहुत डरावनी है। वह रिपोर्ट बताती है कि सरकारें अपने नागरिकों पर जुल्म कर रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ जेल में सजा भुगत रहे कुल लोगों का 21.7 प्रतिशत दलित हैं, जबकि जनसंख्या में उनका अनुपात सिर्फ 16.6 प्रतिशत है, यानि जनसंख्या में अपने अनुपात से करीब 6 प्रतिशत अधिक दलित जेल की सजा काट रहे हैं। 21 प्रतिशत दलित ऐसे हैं, जो बिना सजा के ही जेलों में हैं, जिन्हें अंडरट्रायल कहा जाता है। आदिवासियों के हालात भी बदतर हैं। भारत में आदिवासियों का जनसंख्या में अनुपात 8.6 प्रतिशत है, लेकिन 13.6 प्रतिशत आदिवासी जेलों में सजा भुगत रहे हैं इनमें 10.5 प्रतिशत ऐसे हैं, जो बिना सजा के जेलों में ( अंडरट्रायल) हैं। यानि अपनी जनसंख्या में अपने अनुपात से 5 प्रतिशत अधिक आदिवासी जेलों में है।
मुसलमानों के हालात भी बदतर हैं। भारत में मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत ही है। लेकिन अंडर ट्रायल (बिना सजा) के जेल में बंद, मुसलमानों का प्रतिशत 18.7 है। यानि जनंख्या में अनुपात से 4.4 प्रतिशत अधिक। सजा काटने वालों का अनुपात 16.6 प्रतिशत है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जेलों में सजा काट रहे कुल लोगों का 51.6 प्रतिशत या तो दलित है, या आदिवासी या मुसलमान। जबकि जनसंख्या में इन तीनों का कुल अनुपात 39. 4 प्रतिशत है यानि जनससंख्या में अपने अनुपात से करीब 11 प्रतिशत अधिक दलित, आदिवासी और मुस्लिम जेलों में हैं।
हमारे सामने ऐसे भी कई मामले आए हैं जिसमें बेनुगाह होते हुए भी नागरिकों ने अपनी ज़िंदगी के चार से लेकर 25 साल तक जेल में बिताए हैं। ऐसा तो अंग्रेज़ों के समय में भी नहीं होता था, जबकि भारत ‘ग़ुलाम’ था, लेकिन अब हो रहा है। आज़ादी मिलने के बाद हो रहा है। क्या सरकार द्वारा नागरिकों पर किये जाने वाला यह ज़ुल्म बंद होगा? वोट बैंक, ध्रुवीकरण की राजनीति ने अपने ही देश के नागरिकों की ज़िंदगी को क़ैदखानों में तब्दील कर दिया है।
बड़ी अदालतों ने थोड़ा भ्रम बनाकर रखा हुआ है, अगर यह भ्रम भी टूट गया तो न्यायपालिका की अस्मिता तार-तार हो जाएगी।
“अगर थोड़े भी इंसाफ परवर लोग हो जाते, तो कोई बेगुनाह इन क़ैदखानों में नहीं मिलता।” (अंतरराष्ट्रीय कवि जनाब मुनव्वर राना)।
एक पेशेवर डॉक्टर को इतने दिन जेल में रखा गया क्या कोई सरकार इनके जितने दिन जेल में बीते है कोई लौटा सकता है नहीं फिर ऐसे अधिकारियों और नौकरशाहों के ऊपर करवाई होनी चाहिए उनको बताना चाहिए आखिर किस बिना पे उनको इतने दिन जेल में रखा गया इसकी भरपाई कौन करेगा जवाबदेही तय होनी चाहिए नहीं तो ये लोग ऐसे ही किसी को भी अंदर डाल कर उसकी जिंदगी खराब करेंगे यह NSA का दुरूपयोग है।
माननीय न्यायालय से एक अनुरोध है कि इसका दुरूपयोग रोकने के लिए उस अधिकारी या अधिकारियों के‌ खिलाफ ‌सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने इन घटिया ‌राजनीतिज्ञों के कहने पर यह हरकत की और ‌इस तरह के केसों की सुनवाई शीघ्र ता शीघ्र होनी चाहिए।

डॉ कफ़ील खान के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने आज दिल्ली दंगों के आरोप में कई महीनों से जेल में बंद देवांगना कलीता की जमानत अर्जी मंजूर कर ली है। देवांगना नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शन का हिस्सा रही हैं जिसके कारण उन्हें पुलिस ने दिल्ली दंगों का आरोपी बना दिया था ।

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