शासनिक उदासीनता मुख्य कारण गुम होती निष्पक्ष पत्रकारिता का।
(मोo ताहिर अहमद वारसी)
यू तो जग की रीति चली आई है कि जिस जाति ,प्रजाति को खत्म करना हो उसी मे से कुछ को उन्ही का विरोधी बना दो ,दो भागों में बटने के बाद वो आसानी से खत्म हो जाए गे और किसी की बुराई भी नही पड़े गी ।अंग्रेजो की फूट डालो राज करो नीति के तहत भारतीय पत्रकारिता जगत को बदनाम कर समाप्त करने के लिए हमेशा से दलालों को प्रोत्साहित कर आगे बढाने का प्रयास किया गया और निर्भिक एवं निष्पक्ष पत्रकारों को हमेशा से सत्ता समर्थकों, माफियाओ, दलालों, भ्रष्टाचारियों द्वारा प्रताड़ित कर उन की आवाज़ दबाने का प्रयास किया गया है ।आज की स्थिति किसी जनमानस से छुपी नही है हर जगह हर विभाग मे ,पुलिस
चौकी से लेकर बड़े अधिकारियों तक प्रशासन से लेकर शासन तक कोई भी काम बिना इन दलालों को चढावा चढ़ाए करना सूरज को चराग दिखाने के समान हो गया है।खबर पर कार्रवाई भी मात्र कार्पोरेट घरानों के अखबारों तक ही सीमित है जो आज के समय मे लाखों, करोड़ों के विज्ञापनों से भर कर 15रुपये लागत के अखबार 4से 5 रूपये मे बेंच रहे है हद तो ये है कि छोटे क्षेत्रीय अखबारों/पत्रिकाओं की खबरों से भ्रष्टाचारियों के साथ साथ अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेगती उल्टा सच लिखने व दिखाने पर धमकियां, मुकदमें, गालियाँ, गोलियां या जेल ही निष्पक्ष पत्रकारों के हाथ लगता है कारण कही न कही शासन ,प्रशासन की भी मंशा निष्पक्ष पत्रकारिता को समाप्त करना है पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश मे पत्रकारों के साथ सब कुछ हुआ परंतु न मुख्यालय मान्यता प्राप्त समिति न कोई पत्रकार संस्था न प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया ने आगे आकर उन पत्रकारों की आवाज़ सुनी ।

मुख्यमंत्री से लेकर प्रधान मंत्री कार्यालय तक गुहार लगाने के बाद या तो पत्रकारों ने अपना चरित्र बदल लिया या सन्यास या मौत । लोकतंत्र के इस मौखिक चौथे स्तम्भ के पास न तो कोई सरकारी संसाधन है न इन की सुनने वाली कोई संस्था और अगर है भी तो वहां भी सत्ता के दुलारे दलाल जो सत्ता की हनक से कुर्सी पर बैठाले गए है वो भी सत्ता के तलवे चाटने मे इतना व्यस्त है कि सत्ता विरोधी खबरों पर उत्पीड़न उन्हें न दिखाई देता है न पत्रकारों की आहे उन के कानों से सुनाई देती है ।अब छोटे एवं मझोले पत्रकारों के पास मात्र एक विकल्प न्यायालय बचा ।वहां भी सुनवाई के लिए महंगे वकील की फीस भरना गरीब व कमजोर पत्रकारों के बस की बात नहीं सो ये कहना गलत न होगा की निर्भिक, निष्पक्ष पत्रकारिता या समाप्त होने की ओर है या सन्यास की ओर।






