सांसद नीलेश लंके का बड़ा धमाका: फ्यूचर गेमिंग कंपनी पर कर चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप, DGP को लिखा पत्र

सांसद नीलेश लंके

मुंबई (विशेष प्रतिनिधी) | अहमदनगर से सांसद नीलेश ज्ञानदेव लंके ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) को एक पत्र लिखकर लॉटरी व्यवसाय में चल रहे बड़े खेल का पर्दाफाश किया है। सांसद ने मेसर्स फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज (प्राइवेट) लिमिटेड पर अन्य राज्यों की लॉटरी के नाम पर महाराष्ट्र के लोगों के साथ धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग और करोड़ों रुपये की कर चोरी का गंभीर आरोप लगाया है।

 

सांसद लंकेने पत्र में इस बात पर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कंपनी के मालिक श्री सैंटियागो मार्टिन की अनियमितताओं की जानकारी महाराष्ट्र पुलिस के साथ साझा की थी, लेकिन इसके बावजूद अब तक कोई ठोस जांच नहीं की गई है। कंपनी का कार्यालय मुंबई के अंधेरी (पूर्व) स्थित ‘349 बिजनेस पॉइंट’ में संचालित है।

सांसद नीलेश लंके ने अपने पत्र में नागालैंड, पंजाब और सिक्किम सरकारों की लॉटरी टिकटों की बिक्री में ‘लॉटरी विनियमन नियम 2010’ के नियम 3(3) का उल्लंघन किया जा रहा है। ये राज्य मुद्रित टिकटों की वास्तविक संख्या घोषित नहीं कर रहे हैं। इससे यह आशंका पैदा होती है कि विजेता नंबर उन टिकटों से निकाले जा रहे हैं जो कभी छपे ही नहीं, जो सीधे तौर पर जनता के साथ धोखाधड़ी है। आरोप है कि नागालैंड और सिक्किम की लॉटरी टिकटों को छोटे बंडलों में बेचा जाता है ताकि आयकर अधिनियम की धारा 194B (TDS) से बचा जा सके। इसके जरिए 10,000 रुपये से लेकर 18 लाख रुपये तक की पुरस्कार राशि नकद में बांटकर प्रति वर्ष 1500-2000 करोड़ रुपये के राजस्व का चूना लगाया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, आयकर विभाग पहले ही इस संबंध में 6000 करोड़ रुपये का नोटिस जारी कर चुका है। साप्ताहिक लॉटरी के नाम पर अवैध रूप से बंपर लॉटरी बेची जा रही है, जो लॉटरी विनियमन अधिनियम 1998 की धारा 2(क) का स्पष्ट उल्लंघन है। राज्य सरकारों की लॉटरी बेचने वाले एजेंटों का कोई आधिकारिक पंजीकरण या प्रमाणीकरण नहीं है। इस अस्पष्टता के कारण पुलिस के लिए असली और अवैध लॉटरी संचालकों की पहचान करना नामुमकिन हो गया है। ये नियमों के उल्लंघन साझा किए हैं।

सांसद लंके ने पुलिस विभाग से इस पूरे मामले की गहन जांच करने का अनुरोध किया है। उन्होंने मांग की है कि लॉटरी विनियमन अधिनियम 1998 की धारा 7, 8 और 9 के तहत कार्रवाई हो। भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) की संबंधित धाराओं के तहत दोषियों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए।

 

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