जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 25 जून को मुझे राजस्थान के नागौर जिले के ऐतिहासिक शहर मेड़ता में जाने का अवसर मिला। मेड़ता पहुंचने पर चारभुजा नाथ मंदिर के दर्शन न किए जाए ऐसा संभव नहीं। सनातन संस्कृति में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति उन चारभुजा नाथ के दर्शन अवश्य करेगा, जिन्होंने करीब सवा पांच सौ वर्ष पहले भक्त शिरोमणि मीरा बाई के हाथों से दूध पिया। चारभुजा नाथ के ईश्वर स्वरूप के दर्शन से जो आत्मनुभूति हुई, उसकी शब्दों में उल्लेख नहीं किया जा सकता। मंदिर के पुजारी रजनीश शर्मा ने बताया कि मीरा बाई से जब चारभुजा नाथ को दूध पिलाने का सबूत मांगा गया तो मीरा ने लोगों की मौजूदगी में ही दूध से भरा पात्र विग्रह के सामने रख दिया। चारभुजा नाथ स्वरूप विग्रह ने आंखे तिरछी कर दूध पी लिया। सनातन संस्कृति में भरोसा रखने वाले और मेड़ता के नागरिक मानते हैं कि यह चारभुजा नाथ की सिर्फ कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि स्वयं विष्णु स्वरूप ठाकुर जी विराजमान हैं। इस प्रतिमा को किसी कारीगर ने नहीं बनाया, बल्कि स्वयं भू गर्भ से निकली है। कोई 600 वर्ष पहले जीनगर (मोची) समुदाय के रामधन जीनगर को प्रतिदिन इस बात पर गुस्सा आता था कि कोई व्यक्ति उसकी गाय के थनों से दूध चुरा लेता है। एक दिन रामधन ने स्वयं गाय की निगरानी की तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। जंगल में एक स्थान पर गायों के थनों से अपने आप दूध निकलने लगा। गाय भी तब तक खड़ी रही, जब तक थनों का दूध खत्म नहीं हो गया। रामधन ने देखा कि दूध चारभुजा नाथ के विग्रह पर गिर रहा है। यह बात तबके राजा राव दूदा को बताई गई। राव दूदा ने तब इस चमत्कारिक विग्रह की स्थापना की। इन्हीं चारभुजा नाथ मंदिर से मीरा की प्रेम कहानी जुड़ी हुई है। चूंकि रामधन जीनगर ने चारभुजा नाथ के विग्रह के बारे में बताया था, इसलिए राव दूदा ने फरमान जारी किया कि मंदिर में प्रसाद का पहला भोग रामधन के द्वारा ही लगाया जाएगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। आज भी रामधन के परिवार से संबंध रखने वाले भजनलाल जीनगर रोजाना मावे का प्रसाद अर्पित करते हैं। जीनगर परिवार के प्रसाद के बाद ही अन्य श्रद्धालुओं की ओर से प्रसाद अर्पित किया जाता है। प्रसाद की परंपरा के बारे में मोबाइल नम्बर 9252732138 पर भजनलाल गहलोत से ली जा सकती है।
चारभुजा नाथ ने तपस्वी मीरा बाई के हाथों से दूध पीने के साथ साथ अपने भक्त और तबके मेड़ता के राजा राव जयममल के लिए युद्ध भी लड़ा। राव जयमल प्रतिदिन चार घंटे चारभुजा नाथ के सामने भक्ति में लीन रहते थे। कोई विघ्न न डाले, इसलिए नंगी तलवार साथ में रखते थे। एक बार भक्ति के दौरान ही पड़ौसी राज्य के राजा मालदेव ने हमला कर दिया। तब सवाल उठा कि भक्ति के समय राव जयमल को हमले की सूचना कौन दे? यदि कोई सामने जाएगा तो तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दी जाएगी। लेकिन थोड़ी ही देर में तब आश्चर्य हुआ जब राव जयमल के नेतृत्व में मेड़ता की सेना युद्ध के मैदान में पहुंच गई। इधर भक्त जयमल भक्ति में लीन थे, तो उधर युद्ध के मैदान से राव जयमल की जय घोष की आवाजें आने लगी। राव जयमल समझ गए कि चारभुजा नाथ ने अपने भक्त की लाज रखी है। ऐसी चमत्कारिक घटनाओं के मद्देनजर ही मेड़ता में चारभुजा नाथ के विग्रह को ईश्वर का स्वरूप माना जाता है। मीरा बाई से जुड़ी घटनाओं ने मंदिर की ख्याति को और बढ़ाया। चारभुजा नाथ के आशीर्वाद से ही राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे औंकार सिंह लखावत ने मंदिर के निकट ही ऐतिहासिक दस्तावेजों को एक संग्रहालय में संजोकर रखा है। इसके लिए लखावत भी बधाई के पात्र हैं। चारभुजा नाथ के दर्शन से ही मेरी मेड़ता यात्रा सफल रही। अवसर मिला तो जल्द ही दोबारा से भगवान चारभुजा नाथ के दर्शन होंगे। मेड़ता में ऐसे अनेक परिवार हैं जो चारभुजा नाथ को छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहते हैं। इसे भगवान चारभुजा नाथ का अशीर्वाद ही कहा जाएगा कि मेड़ता नहीं छोडऩे वाले परिवार खूब फलफूल रहे हैं।
भगवान चारभुजा नाथ के मंदिर के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले मेड़ता के अग्रवाल परिवार के सदस्य जुगल किशोर अग्रवाल ने बताया कि पिछले दिनों उनके 95 वर्षीय दादाजी ने कहा कि भगवान चारभुजा नाथ के मस्तिष्क पर सोने का मुकुट होना चाहिए। दादाजी की इच्छा के अनुरूप संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों ने सहयोग कर 600 ग्राम का सोने का मुकुट बनवा कर विग्रह पर स्थापित किया। अग्रवाल कहना है कि आज भगवान चारभुजनाथ के आशीर्वाद से ही उनका परिवार सम्पन्न है। मंदिर और भगवान चारभुजा नाथ के बारे में और अधिक जानकारी मोबाइल नम्बर 7014553102 पर जुगल किशोर अग्रवाल से ली जा सकती है। मंदिर में जब तपस्वी मीरा बाई की प्रतिमा लगाने की बात आई तो एक मुस्लिम कारीगर ने पहल की। कथकारों के अनुसार मुस्लिम कारीगर ने मंदिर परिसर में ही रह कर रात और दिन कामकर प्रतिमा बनाई। इस दौरान कारीगर ने सिर्फ दूध का सेवन किया। मीरा की प्रतिमा चारभुजा नाथ के विग्रह के ठीक सामने हैं। हालांकि दोनों में करीब 100 फिट की दूरी होगी, लेकिन खास बात यह है कि विग्रह और मीरा की प्रतिमा की आंखे समान ऊंचाई पर है। यानि मीरा बाई की आंखें अपने भगवान की आंखों से मिली हुई है।







