नवी दिल्ली (उपसंपादक तहरीम वाहिद) – देश के सबसे ताकतवर फाइटर विमान राफेल स्क्वाड्रन गोल्डन ऐरो के लिए विशेषज्ञ पायलट चयनित करने के लिए वायु सेना की ओर से प्रशिक्षण में जब बेटी शिवांगी को शामिल किया गया, तभी यकीन हो गया था कि यहां भी बेटी खुद को साबित करेगी।
प्रशिक्षण के बाद जब बेटी के चयन की जानकारी मिली तो खुशी के मारे पूरी रात नींद नहीं आई। बेटी की इतनी बड़ी सफलता पर भाव और जज्बात बयां नहीं किया जा रहा।’ ये अलफाज शिवांगी की मां सीमा सिंह के थे।
लगन और अनवरत प्रयास हो तो लक्ष्य पाना मुश्किल नहीं है। शहर के फुलवरिया गांव में रहने वाली शिवांगी सिंह ने इसे कर दिखाया। वायु सेना में फाइटर विमान उड़ाने का सपना पाला और लीक से हटकर इसी के लिए जी-तोड़ मेहनत की। अब एक नया इतिहास भी रच दिया। फुलवरिया रेलवे क्रासिंग के निकट तीन दशक पुराने मकान में शिवांगी की मां सीमा सिंह, पिता कुमारेश्वर सिंह, भाई मयंक सिंह, शुभांशु, हिमांशी, बड़े पिता राजेश्वर सिंह, बड़ी मां बेटी की उपलब्धि पर खुशियां मनाने में जुटा था।
पिता कुमारेश्वर ने बताया कि मंगलवार शाम को बेटी के चयन की जानकारी मिली। बताया गया कि उनकी बेटी देश की पहली और इकलौती पायलट है जो वायु सेना के बेड़े में शामिल हुए राफेल के गोल्डेन ऐरा की टीम में शामिल हुई है। शिवांगी वायु सेना का फाइटर विमान मिग -21 बाइसन उड़ाती हैं। वह राफेल के लिए अंबाला में तकनीकी प्रशिक्षण ले रही थीं।
बेटी की सफलता की जानकारी पर पास-पड़ोस के बच्चे और बुजुर्ग भी पहुंचे। घर हलवा बना और एक-दूसरे का मुंह मीठा कराकर खुशियां जताई गई। पड़ोस के शुभम सिंह, मल्लिका सिंह, कृष्णकांत सिंह, जाह्नवी सिंह, आदित्य सिंह का कहना था कि दीदी हमारे लिए ही नहीं, हर एक युवा के लिए प्रेरणास्रोत बन गई हैं।
शिवांगी के नाना कर्नल वीएन सिंह सेवानिवृत्ति के बाद नई दिल्ली में रहने लगे। वहां अक्सर शिवांगी अपनी मां व भाई के साथ जाती थीं। मां सीमा सिंह बताती हैं, हाई-स्कूल की पढ़ाई के दौरान पिताजी नई दिल्ली में बच्चों को एयरफोर्स का म्यूजियम दिखाने गये। वहां एयरफोर्स के विमान और वायु सैनिकों की ड्रेस देखकर शिवांगी रोमांचित हो गई। वहीं नाना से बोली कि उसे भी वायु सेना में जाना है। ऐसी ही ड्रेस पहननी है और ये फाइटर विमान भी उड़ाना है। इसके बाद यहीं से जीवन का लक्ष्य तय कर लिया।
मां सीमा सिंह ने बच्चों की परवरिश के लिए त्याग किया। वह नई दिल्ली से स्नातक कीं। शादी के बाद वाराणसी आईं और स्नातकोत्तर के बाद बीएड की पढ़ाई पूरी की। साल 2007 में उनका चयन सरकारी शिक्षिका के रूप में हुआ। बच्चे पढ़ रहे थे, उन्हें लगा कि नौकरी करने पर बच्चों की बेहतर परवरिश और पढ़ाई में अड़चन आयेगी। इसलिए उन्होंने नौकरी नहीं की। पिता कुमारेश्वर सिंह ने बेटी की हर इच्छा पूरी की। पढ़ाई के दौरान कोई कमी नहीं आने दी।







