किसानों के लिए बनाये गये नए कानून को लेकर किसान संगठनों की सहमति न लेना किसानों के मौलिक अधिकारों का हनन है।

नई दिल्ली (उपसंपादक तहरीम वाहिद) – हमारी सरकार न किसान यूनियनों से कोई बातचीत, न पार्लियामेंट में चर्चा और अपोजीशन पार्टियों को एतमाद (विश्वास) में लिए बगैर केंद्र सरकार ने किसानों से मुताल्लिक (संबंध) तीन बिल पार्लियामेंट में जबरदस्ती पास करा लिए। मुल्क के किसान सड़कों पर, तो अपोजीशन पार्टियाँ पार्लियामेंट से राष्ट्रपति भवन तक दौड़ लगाती रही, लेकिन मोदी हुकूमत ने किसी की एक बात भी नहीं सुनी। किसान यूनियनों और अपोजीशन पार्टियों का कहना था कि अगर सरकार को ऐसा बिल लाना ही था तो उसमें इतना और जोड़ देती कि देश के किसी भी कोने में अढ़तिए (मध्यस्थ) या व्यापारी किसानों को उनकी पैदावार का सरकार के जरिए तय की गई कीमत से कम दाम देता है तो किसान को अदालत में जाने का हक हासिल होगा। सरकार तैयार नहीं हुई तो किसान यूनियनों ने इल्जाम लगाया कि मोदी ने कारपोरेट घराने के किसी चार्टर्ड एकाउटेंट के बनाए हुए बिल पार्लियामेंट से पास करा दिए। लोकसभा में सरकार की अक्सरियत (बहुमत) थी, लेकिन राज्य सभा में अक्सरियत(बहुमत) न होने के बावजूद डिप्टी चेयरमैन हरिवंश सिंह ने आवाज के वोट की बुनियाद पर कानून पास होने का एलान कर दिया। अपोजीशन वोटिंग का मोतालबा(मांग) करता रहा, लेकिन डिप्टी चेयरमैन ने एक न सुनी, इस तरह उन्होंने देश की पार्लियामेंट की तारीख में एक स्याह बाब (अध्याय) जोड़ दिया।
राज्य सभा में अपोजीशन पार्टियों ने हंगामा किया तो अपोजीशन के आठ मेम्बरान को मानसून इजलास की बाकी मुद्दत के लिए मोअत्तल (बर्खास्त) कर दिया गया। जवाब में अपोजीशन पार्टियों ने राज्य सभा और लोकसभा का बायकॉट किया। तब केंद्र सरकार ने अपोजीशन की गैर हाजिरी में ही अपनी मर्जी के बिल पास कराकर 23 सितम्बर को ही राज्य सभा और लोकसभा को गैर मुअय्यना मुद्दत (अनिश्चित कालीन अवधि) के लिए मुल्तवी कर दिया। हालांकि तय यह हुआ था कि पार्लियामेंट की कार्रवाई तीस सितम्बर तक चलेगी। बीस सितम्बर को राज्य सभा में जब जबरदस्ती किसान बिल पास कराया जा रहा था तो अपोजीशन के कई मेम्बरान ने जबरदस्त हंगामा किया। पूरी कार्रवाई पर अफसोस जाहिर करने के बजाए सरकार और चेयरमैन की तरफ से यह कहा गया कि अपोजीशन मेम्बरान ने जो हंगामा किया, उससे राज्य सभा का वकार (गरिमा) कम हुआ। जबकि हकीकत यह है कि राज्य सभा का वकार गिराने का काम सरकार और डिप्टी चेयरमैन हरिवंश सिंह ने मिल कर किया।
जिन आठ राज्य सभा मेम्बरान को मोअत्तल किया गया था, उनमें तृणमूल कांग्रेस के डेरेक-ओ-ब्रायन, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस की डोला सेन, कांग्रेस के राजीव साटव, सैयद नासिर हुसैन और रिपुन बोरा, सीपीएम के के.के. रागेश और एलामाराम करीम शामिल थे। इन सभी ने पार्लियामेंट के कैम्पस में लगी गांधी की मूर्ति के सामने सारी रात धरना दिया तो अगले दिन सुबह डिप्टी चेयरमैन हरिवंश सिंह उनके लिए चाय-नाश्ता लेकर पहुंए गए। लेकिन धरना दे रहे मेम्बरान ने उनकी चाय नहीं पी। नायब सदर जम्हूरिया (उप राष्ट्रपति) और राज्य सभा के चेयरमैन वेंकया नायडू ने कहा कि अगर मार्शल न आते तो उस दिन राज्य सभा में बहुत संगीन वारदात हो सकती थी। एक दो नहीं राजनाथ सिंह समेत छः वजीर प्रेस कांफ्रेन्स करने आए। जिसमें रविशंकर प्रसाद ने दावा किया कि राज्यसभा में उनके पास मुकम्मल अक्सरियत(बहुमत) थी। सवाल यह है कि अगर उनके पास अक्सरियत थी तो सरकार वोटिंग कराने से क्यों भागी?
राज्य सभा से जिस ढंग से किसानों और किसानी से मुताल्लिक दो बिलों को पास कराया गया, अपोजीशन लीडरों का सीधे तौर पर कहना है कि जम्हूरियत के मंदिर में ही जम्हूरियत का गला घोंटने के जुर्म को अंजाम दिया गया। जबकि कांग्रेस ने कहा कि राज्य सभा में किसान से मुताल्लिका(संबंध) बिलों को जिस तरह आवाज के वोट से पास कराने का एलान किया गया, गैर आईनी (संवैधानिक) और किसानों के खिलाफ है इसी सबब आज के दिन को मुल्क की तारीख में ‘यौम-ए-स्याह’ के तौर पर याद किया जायेगा। कांग्रेस लीडर अहमद पटेल, प्रताप सिंह बाजवा, अभिषेक मनु सिंधवी ने एक मुश्तरका प्रेस कांफ्रेन्स में कहा कि इन बिलों को जिस तरह राज्य सभा में पास कराया गया वह जम्हूरियत(लोकतंत्र) का कत्ल है। इन लीडरों ने कहा कि हुकूमत अब खेती को कारपोरेट शोबे(उद्योगपतियों) को देना चाहती है। एम.एस.पी. यानी सहारा कीमत के ताल्लुक से वजीर-ए-आजम (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी जो बयान दे रहे हैं उसमें कोई सच्चाई नहीं है यह कानून पूरी तौर से किसानों के खिलाफ है और इससे उन्हें शदीद नुकसान पहुंचेगा। जबकि तृणमूल कांग्रेस के डेरेक-ओ ब्रायन ने कहा कि राज्य सभा में पार्लियामानी जम्हूरियत का बेरहमाना कत्ल हुआ है। वहीं आम आदमी पार्टी के राज्य सभा मेम्बर संजय सिंह ने कहा कि हां मैं टेबुल पर खड़ा हुआ, मैं इसको तस्लीम करता हूं राज्य सभा में जो हुआ बहुत ही खराब था क्योंकि तमाम जवाबित(आपत्तियों) को नजरअंदाज किया गया और किसानों को बड़े कारपोरेट के हवाले कर दिया गया और सरकार ने ऐसा करने का मुकम्मम (पक्का) इरादा करके ही बिलों को पेश किया था।
राज्य सभा से किसानी से मुताल्लिक बिल पास होने पर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर कहा कि इससे जराअत (कृषि) के शोबे में बुनियादी तब्दीलियां आयेंगी और करोड़ों किसान खुद कफील (आत्मनिर्भर) होंगे। ट्वीट के जरिये किसानों को मुबारकबाद देते हुये कहा कि हिन्दुस्तान की जरई तारीख (कृषि इतिहास) में आज एक बड़ा दिन है यह ना सिर्फ जरई शोबे (कृषि क्षेत्र) में तब्दीली लायेगा। एक दूसरे ट्वीट में उन्होंने कहा कि जरई शोबे को जदीदतरीन तकनीक की फौरी जरूरत है क्योंकि इससे मेहनतकश (श्रमिक) किसानों को मदद मिलेगी। इससे पैदावार बढ़ेगी और बेहतर नतायज (परिणाम) सामने आयेंगे। दहाइयों से हमारे किसान भाई बहन कई तरह की बंदिशों में जकड़े हुये थे और उन्हें बिचौलियों का सामना करना पड़ता था किसानो को अब इन सबसे आजादी मिली है इससे किसानो की आमदनी दोगुना करने की कोशिशों को तकवियत मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि एम.एस.पी. का निजाम बदस्तूर जारी रहेगा। सरकारी खरीद जारी रहेगी। वजीर-ए-आजम की एम.एस.पी. और सरकारी खरीद जारी रखने की बात को अपोजीशन पार्टियों ने सिरे से मुस्तरद कर दिया, तो किसान इसे मोदी का छलावा मान रहे हैं।
पंजाब और हरियाणा के किसानों का गुस्सा सड़कों पर मुजाहिरों की शक्ल में नजर आ रहा है। खेती-किसानी बिल वापस लेने के मुतालबे से मुल्क के दूसरे हिस्सों के किसानों का गुस्सा बढ़ने और सड़कों पर मुजाहिरों की खबरों में मुसलसल इजाफा होता जा रहा है। मुल्कगीर तहरीक (राष्ट्रव्यापी आंदोलन ) चलाने के भी एलान हो चुके हैं। अभी तक किसानों की तहरीक का मरकज पंजाब है जहां 24 सितम्बर से 26 सितम्बर तक रियासत से गुजरने वाली रेलगाड़ियों को नहीं चलने दिये जाने का एलान से बीजेपी को छोड़कर सूबे की तमाम सियासी पार्टियों का किसानों के हक में खड़ा होना मजबूरी बन गया है तभी तो बीजेपी की दहाइयों पुरानी साथी पार्टी शिरोमणि अकाली दल की मरकजी हुकूमत में शामिल अकेली वजीर हरसिमरत कौर को इस्तीफा दिलाने पर मजबूर होना पड़ा। जिस तरह से किसानों का आंदोलन शिद्दत अख्तियार करता जा रहा है हरियाणा में खट्टर सरकार बनवाने वाले दुश्यंत चौटाला कितने दिन हुकूमत में शामिल रहेंगे किसानों के गुस्से को देखते हुए कहना मुश्किल हो गया है। मगरिबी उत्तर प्रदेश के किसान भी जरई कानून की मुखालिफत में सड़कों पर आ चुके हैं। पार्लियामेंट का घेराव भी हो चुका है जो यूथ कांग्रेस की कयादत में किया गया। कांग्रेस पहले ही एलान कर चुकी है कि वह किसान मुखालिफ जरई बिल के खिलाफ मुल्कगीर तहरीक चलायेगी।
किसानी बिलों पर राज्य सभा में एक मुख्तसर बहस हुई। छोटी पार्टियों को महज दो मिनट में अपनी बात रखने की इजाजत थी इससे भी अपोजीशन मेम्बरान में नाराजगी थी लेकिन जब डिप्टी चेयरमैन हरिवंश नरायन सिंह ने हिज्बे मुखालिफ के हर मुतालबे को नजरअंदाज करने का रवैया अख्तियार किया न बिल को पार्लियामानी कमेटी और सेलेक्ट कमेटी को राजी हुये तो अपोजीशन मेम्बरान मजीद बरहम हुये उनके गुस्से का पारा तेजी से चढ़ा जब बिल पर वोटिंग को भी नहीं माना गया और अपोजीशन के मेम्बरान वेल में पहुंच कर हंगामा करने लगे। अपोजीशन मेम्बरान ने यह इल्जाम भी लगाया कि माईक को म्यूट कर दिया गया ताकि राज्यसभा की कार्रवाई को बराहे रास्त नश्र किया जा रहा था देश को यह मालूम ही न हो सके कि वह क्या कह रहे हैं और क्या मुतालबा कर रहे हैं। हंगामे के सबब एवान की कार्रवाई को दो बार मुल्तवी किया गया जब एवान की कार्रवाई शुरू हुई तो डिप्टी चेयरमैन ने बिलों के आवाज के वोट से पास होने का एलान कर दिया। फिर देश और दुनिया ने जो देखा वह राज्य सभा के वकार को ठेस पहुंचाने वाला था। हंगामा करने और डिप्टी चेयरमैन की टेबुल पर रखे कुछ कागजात फाड़ने और माईक तोड़ने का अफसोसनाक वाक्या पेश आया लेकिन मीडिया ने इस मामले को यकतरफा तौर पर पेश करके हिज्बे मुखालिफ के मेम्बरों को कटघरे में खड़ा किया और यहां तक दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस के डेरेक-ओ-ब्रायन ने रूल बुक तक फाड़ दी लेकिन सच्चाई यह है कि तृणमूल कांग्रेस के मेम्बर डिप्टी चेयरमैन को रूल बुक दिखा कर यह कह रहे थे कि आपने किस रूल के तहत वोटिंग नहीं करायी। डिप्टी चेयरमैन का वोटिंग न कराने का फैसला अपोजीशन के उस इल्जाम को तकवियत पहुंचाता है कि अगर वोटिंग होती तो यह बिल गिर जाता और सरकार की बड़ी हेठी होती।
राज्य सभा में लीडर ऑफ अपोजीशन गुलाम नबी आजाद ने सारे मामले में मसालेहत की भरपूर कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सके। उन्होंने अपोजीशन के मानसून इजलास को बायकाट करने का एलान कर दिया और कहा कि यह बायकाट तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार नया बिल लाने की यकीन दहानी नहीं कराती, एम.एस.पी. को बिल में नहीं जोड़ती और आठ मेम्बरान की मुअत्तली को वापस नहीं लेती। मगर अचानक यह फैसला हो गया कि मानसून इजलास को 23 सितम्बर को गैर मुअय्यना मुद्दत के लिये मुल्तवी कर दिया गया है और इसी के साथ यह भी दर्ज हो गया कि यह सबसे मुख्तसर मानूसन इजलास था।
केंद्र सरकार की मनमानी का क्या परिणाम होगा ये तो समय ही बताएगा। भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए किसानों का अत्यधिक महत्व है देश की प्रगति एवं उन्नति में।

 

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