मुंबई (विशेष प्रतिनिधी) – फिल्मो के पितामह दादा साहिब फाल्के , वी शांताराम , दादा कोंडके , पृथ्वीराज कपूर, जैसे फ़िल्म निर्माण के सूत्रधार रहे हैं। इन्होंने समाज को नई दिशा व नई शिक्षा फिल्मो के माध्यम से देने का काम किया हैं। फ़िल्म इंडस्ट्रीज में चार दशक में नए नए निर्माताओ के पर्दापण हुआ और फिल्मो का निर्माण चरमसीमा पर था।
राजकपूर, ऋषिकेश मुखर्जी, बी. आर. चोपड़ा, रमन लाल देसाई, यश चोपड़ा , बी.आर, इशारा, रामानन्द सागर, राज सिप्पी, के अलावा नए प्रोड्यूसरों सुभाष घई, महेश भट्ट, व अन्य निर्माताओ ने रोमांटिक तथा अंग प्रदर्शन परोसने का काम फिल्मो में किया और फ़िल्म इंडस्ट्रीज में अंडरवर्ड का पैसा फिल्मो में लगना प्रारम्भ हो गया। जिससे फ़िल्म इंडस्ट्रीज की चमक धमक और बढ़ती गयी ।
इस चकाचोंध से नई नई लड़कियो का इंडस्ट्रीज में पदार्पण होना प्रारम्भ हो गया। माधुरी दीक्षित, काजोल, श्री देवी, जयाप्रदा, भाग्यश्री, नग़मा, दिव्या भारती, जूही चवला, अमृता सिंह, जैसी अनेको लड़किया इंडस्ट्रीज में आई। इनके अलावा नई लड़कियो में फ़िल्म इंडस्ट्रीज में आने के लिये लालायित रही। और आगे के लिए अपने परिवार से समझोता करते हुए लड़भीड़ कर किसी तरह मुम्बई नगरी आई और गलत लोगो के हाथ लग गयी अपना सब कुछ निछावर करते हुयें भी फ़िल्म इंडस्ट्रीज मुक़ाम तक नही पहुँच नही पायी।
पब, क्लब, रेस्त्रां, बार जैसे स्थानों पर अपना मुक़ाम बनाकर मजबूर हुयी। आप काला धन लगने के कारण गलत लोग ही इंडस्ट्रीज में कामयाब हैं।उन्ही की फिल्में सफल होती हैं और थियेटर तक पहुँचती हैं। नए लोगो की फिल्मो का कोई भरोसा नही हैं। कि उनकी फिल्में सफल होगी , कि नही,उनकी शॉर्ट फ़िल्म, बेब सीरीज, क्षेत्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल में प्रदर्शन तक ही सीमित रही हैं। उनकी लगी कीमत भी उनके हाथ नही लगती । क्यों की कुछ चुनांदा लोगो के हाथ की कठपुतली बन कर रही गयी बॉलीबुड फ़िल्म इंडस्ट्रीज ।







