बर्ड फ्लू ने फिर समझाया शाकाहार का महत्व। देश के 8 राज्यों में वायरस के फैलते ही विशेषज्ञों ने माँस नहीं खाने की सलाह दी।

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अंडा और मछली के सेवन पर भी रोक।

अजमेर (एस.पी.मित्तल) – बर्ड फ्लू राजस्थान सहित देश के 8 राज्यो में फैल चुका है। बेजुबान पक्षी कोए, कबूतर, बतख, मुर्गी, कोयल आदि रोजाना बड़ी संख्या में दम तोड़ रहे हैं। पक्षियों की लगातार हो रही मौतों को देखते हुए विशेषज्ञों ने माँस नहीं खाने की सलाह दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मुर्गी के अंडे और मछली सेवन भी नुकसान कर सकता हैं। बर्ड फ्लू के प्रकोप के मद्देनजर एक बार फिर शाकाहार का महत्व समझा जा सकता है।

हालांकि बदलते परिवेश में मांस खाने वालों की संख्या लगतार बढ़ रही है और अब सनातन संस्कृति को मानने वाले भी मांस खाने लगे हैं। हालांकि मांस खाना कोई धार्मिक मामला नहीं है, लेकिन भारत की सनातन संस्कृति में मांस का सेवन निषेध है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यदि जानवर के मांस की प्रोसेसिंग सही ढंग से नहीं की गई तो हानिकारक होगा। विदेशों में फार्म हाउसों में पलने वाले जानवरो का ही मांस खाया जाता है। मांस के प्रोसेसिंग की प्रक्रिया भी लम्बी है, जबकि भारत में तो गली कूचों में घूमने वाले जानवरों का मांस भी खा लिया जाता है अब जब वायरस से पक्षी ही मर रहे हैं तो मांस के जानलेवा हालातों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

जबकि शाकाहार में ऐसा कभी नहीं होता है। मौसम में बदलाव की वजह से कभी कभार सब्जियों के स्वाद में फर्क हो जाता है, लेकिन शाकाहार से कभी भी शरीर को नुकसान नहीं होता। मांसाहार में प्रोटीन होने के तर्क बेमानी हैं। शाकाहार में भी ऐसी अनेक वस्तुएं हैं जो शरीर में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह शाकाहार के कोई साइड इफेक्ट नहीं होते, जबकि माँस खाने वलों को हमेशा खातरा बना रहता है।

ऐसे कई अध्ययन सामने आए हैं, जब फूड पॉइजनिंग की घटनाएं मांस खाने वालों में ज्यादा होती है। माँस खाने वालों के शरीर की पाचनक्रिया भी धीरे होती है। समुन्द्र के किनारे रहने वाले लोगों के लिए सी फूड ही उपलब्ध होता है, लेकिन शहरी क्षेत्र में जहां फल-सब्जियां आराम से उपलब्ध होती है, वहां लोगों को माँस से परहेज करना चाहिए। जो लोग प्रतिदिन मांस खाते हैं, वे यदि एक माह माँस का सेवन त्याग दें तो अपने शरीर में बदलाव देख सकते हैं।

जैन धर्म में तो माँस के सेवन को जीव हत्या से जोड़ रखा है। श्वेताम्बर जैन समाज के साधु संत तो हमेशा अपने मुंह पर कपड़ा (मास्क) बांधकर रखते हैं। ताकि उनके सांस से भी किसी जीव की हत्या न हो। अच्छा हो कि ताजा बर्डफ्लू के प्रकोप से लोग माँस के सेवन को त्यागने की सीख लें। जो लोग शौकिया या स्वाद के लिए माँस का सेवन करते हैं, उन्हें बर्डफ्लूू के माहौल में माँस नहीं खाने का संकल्प लेना चाहिए। शाकाहारी भोजन खाने से मन दिमाग भी शांत रहता है, बल्कि दिमाग ज्यादा स्र्फूत रहता है।

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