राजस्थान की राजनीति पर कपिल सिब्बल का हाईकमान पर हमला।

  • पायलट समर्थक माने जाने वाले मंत्री और विधायक गहलोत के बचाव में नहीं आ रहे।
  • 25 विधायकों के जमा होने के बाद ही भाजपा जंग में कूदेगी।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान की कांग्रेस की राजनीति में जो ताजा भूचाल आया है, उसके पीछे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और डिप्टी सीएम सचिन पायलट को एसओजी द्वारा भेजा गया कानूनी नोटिस बताया जा रहा है। चूंकि गृह विभाग मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पास ही है, इसलिए यह माना जा रहा है कि गहलोत की सहमति से ही पायलट को नोटिस दिया गया। एसओजी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हरिप्रसाद ने यह नोटिस पायलट को 10 जुलाई को ही भिजवा दिया था। इस नोटिस के मिलने के बाद ही पायलट दिल्ली चले गए और राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में भूचाल आ गया। सूत्रों के अनुसार पायलट को इस बात का अफसोस रहा कि भाजपा के शासन में पांच वर्ष तक सड़कों पर संघर्ष किया और अब जब कांग्रेस की सरकार बन गई तो उन्हें ही अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर का अधिकारी नोटिस भेज रहा है। पायलट की नाराजगी के चलते ही राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार खतरे में आ गई है। पायलट को नोटिस दिए जाने की खबर 12 जुलाई को न्यूज चैनलों में प्रसारित हुई। हालांकि 11 जुलाई को प्रेस कॉन्फ्रेंस में गहलोत ने कहा था कि एसओजी का नोटिस उन्हें भी प्राप्त हुआ है। लेकिन 12 जुलाई को पायलट को नोटिस देने की खबरें जिस अंदाज में प्रसारित हुई उससे सीएम गहलोत भी चिंतित हो गए। गहलोत को ट्वीट कर सफाई देने पड़ी। गहलोत ने कहा कि विधायकों की खरीद फरोख्त के प्रकरण में एसओजी ने सामान्य स्तर पर बयान देने के लिए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से समय मांगा है। गहलोत ने आरोप लगाया कि इस नोटिस को मीडिया में गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपा के दो कार्यकर्ता अशोक सिंह चौहान (उदयपुर) और भरत मालानी (ब्यावर) के बीच मोबाइल पर जो वार्ता हुई उसके आधार पर ही एसओजी ने मामला दर्ज किया है। इस बातचीत में कहा गया है कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, जबकि भाजपा वाले पायलट को केन्द्र में मंत्री बनाना चाहते हैं। सूत्रों की माने तो पायलट भाजपा के इन दोनों नेताओं के संवाद को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। लेकिन इस संवाद को आधार बनाकर सचिन पायलट से उनके समर्थक भी नाराज हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि दो कार्यकर्ताओं की आपसी बातचीत क्या मायने रखती है?
सिब्बल का हमला:
राजस्थान की राजनीति में इन दिनों जो कुछ घट रहा है, उस पर कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल ने 12 जुलाई को रोचक और गंभीर टिप्पणी की है। सिब्बल ने ट्वीट कर कहा कि मैं अपनी पार्टी के हालातों को लेकर चिंतित हंू। क्या जब अस्तबल से घोड़े भाग जाएंगे तब हम जागेंगे? सूत्रों के अनुसार सिब्बल ने यह टिप्पणी कांग्रेस हाईकमान के रुख पर की है। राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच आपसी मतभेद समाप्त करवाने के लिए हाईकमान ने अभी तक भी कोई प्रयास नहीं किए हैं।
पायलट समर्थक गहलोत के बचाव में नहीं आ रहे:
यूं तो पिछले दो दिनों से सीएम अशोक गहलोत के सरकारी आवास पर राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से घूम रहा है। हर समय बैठकों का दौर चल रहा है। लेकिन पायलट के समर्थक माने जाने वाले मंत्री और विधायक गहलोत सरकार के बचाव में सामने नहीं आ रहे हैं। खान मंत्री प्रमोद जैन हो या रमेश मीणा ऐसा एक भी मंत्री मीडिया के सामने सीएम गहलोत के पक्ष में नहीं आ रहा है। इसी प्रकार कांग्रेस के विधायक हरीश मीणा, राकेश पारीक जैसे भी सामने नहीं आ रहे हैं। जहां तक परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास का सवाल है तो माना जा रहा है कि अशोक गहलोत से जानकारी लेने के लिए खुला छोड़ रखा है। जरूरत होने पर खाचरियावास भी निर्धारित स्थान पर पहुंच जाएंगे। पायलट समर्थक मंत्रियों और विधायकों के अचानक गायब हो जाने से भी प्रदेश की राजनीति गर्म हो गई है।
भाजपा की नजर:
बताया जा रहा है कि सचिन पायलट के समर्थक मंत्री और विधायक दिल्ली के निकट मानेसर स्थित आईटीसी की होटल में हैं। इनमें निर्दलीय विधायक भी शामिल हैं। भाजपा के बड़े नेताओं की नजर विधायकों की संख्या पर लगी हुई है। यदि 25 विधायक जमा होंगे तो ही भाजपा इस जंग में कूदेगी। राजस्थान में गहलोत के नेतृत्ववाली सरकार गिराने के लिए कम से कम 25 विधायक चाहिए। हालांकि 13 निर्दलीय विधायकों पर दल बदल कानून लागू नहीं होता है। निर्दलीय विधायक किधर भी लुढ़क सकते हैं। जिन सुरेश टाक, ओम प्रकाश हुड़ला और खुशवीर सिंह को तीन दिन पहले तक सीएम गहलोत के संग माना जा रहा था, ये विधायक अब संदेह के घेरे में हैं। एसीबी का आरोप है कि ये तीनों विधायक गहलोत की सरकार गिराने के षडय़ंत्र में शामिल हैं। 12 जुलाई को कई निर्दलीय विधायकों ने जयपुर में गहलोत से मुलाकात की। लेकिन ये तीनों विधायक शामिल नहीं हुए। सुरेश टाक से तो अब मोबाइल पर भी सम्पर्क नहीं हो रहा है।

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