- कांग्रेस विधायक भरत सिंह और अमीन खान तो पहले से ही सरकार से नाराज़ हैं।
- बसपा से आए 6 विधायक भी बेचैन हैं।
अजमेर (एस.पी.मित्तल) – तीन मार्च को राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के विधायक भरत सिंह और अमीन खान ने अपनी ही सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। अमीन खान ने शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा की ऐश-ओ-आराम की जिंदगी पर नाराज़गी जताई तो भरत सिंह ने पुलिस विभाग में भ्रष्ट अधिकारियों को प्राइप पोस्टिंग देने का मुद्दा उठाया। ये दोनों विधायक पहले भी सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं।
आखिर सीएम अशोक गहलोत की भावनाओं के विपरीत पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के बंगले का मुद्दा विधानसभा में क्यों उठाया?
इसलिए इन विधायकों के बयानों पर ज्यादा राजनीति नहीं हो रही है, लेकिन निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने जिस तरह पूर्व सीएम और भाजपा की नेता वसुंधरा राजे के सरकारी बंगले का मुद्दा उठाया उसको लेकर अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का माहौल गर्म हो गया है। ऐसा लगता है कि वसुंधरा राजे के बंगले का मुद्दा उठाकर संयम लोढ़ा ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की दु:खती नस पर हाथ रख दिया है।
सवाल उठता है कि आखिर संयम लोढ़ा ने ऐसा क्यों किया? गत जुलाई में हुए राजनीतिक संकट के समय निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा तो गहलोत सरकार को बचाने में सबसे आगे थे। तब भाजपा को सबसे ज्यादा गालियां संयम लोढ़ा ने ही बकी। राजस्थान विधानसभा में 200 में से 13 निर्दलीय विधायक हैं। सीएम गहलोत ने भी 13 निर्दलीय विधायकों का नेता संयम लोढ़ा को बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बजट सत्र में ही लोढ़ा को डेढ़ वर्ष बोलने का अवसर दिया, जबकि अन्य निर्दलीय विधायक मुश्किल से 10 मिनट ही बोल पाए। लोढ़ा ने जिस तरह सीएम गहलोत का समर्थन किया, उससे माना जा रहा था कि उन्हें मंत्री बनने का अवसर मिलेगा। लेकिन सीएम गहलोत ने अपने मंत्रिमंडल के विस्तार में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं। पहले पंचायतीराज और शहरी निकायों के चुनावों की वजह से विस्तार को टाला गया और अब विधानसभा के चार उपचुनाव के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की बात कही गई है।
जबकि अभी उपचुनावों की घोषणा तक नहीं हुई है। संभवत: इसलिए संयम लोढ़ा का संयम खत्म हो रहा है। आखिर कब तक धैर्य रखा जाए? गहलोत सरकार के पांच वर्ष के कार्यकाल में से ढाई वर्ष तो पूरे हो रहे हैं। ऐसे में बिना मंत्री पद के एक-एक दिन निकालना मुश्किल हो रहा है। तीन मार्च को संयम लोढ़ा ने कांग्रेस सरकार पर कांग्रेस विधायक भरत सिंह और अमीन खान की तरह सीधा हमला नहीं किया, लेकिन सीधे सीएम अशोक गहलोत की दु:खती नस पर हाथ रख दिया। सब जानते हैं कि वसुंधरा राजे को जयपुर में वीआईपी इलाके सिविल लाइन में सरकारी बंगला संख्या 13 में टिकाए रखने के लिए अशोक गहलोत सारे नियम कायदे और हाईकोर्ट के आदेशों को भी ताक पर रख दिया है। सब जानते हैं कि वसुंधरा राजे जब सीएम थीं, तब उन्होंने अपने लिए बंगला संख्या 13 को सरकारी खर्चे पर तैयार करवा लिया था। सत्ता परिवर्तन के बाद गहलोत सरकार ने बंगाल संख्या 13 को पूर्व मुख्यमंत्री के नाते वसुंधरा राजे को आवंटित कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से किसी नेता को केबिनेट मंत्री के स्तर वाला सरकारी बंगला मुफ्त में नहीं दिया जा सकता है।
इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती से सरकारी बंगले खाली करवाए गए, लेकिन राजस्थान में सीएम गहलोत ने सरकारी नियमों में बदलाव कर बंगला संख्या 13 का आवंटन विधानसभा के अधीन कर दिया, ताकि हाईकोर्ट की अवमानना से बचा जा सके। खुद सीएम गहलोत ने कहा कि वसुंधरा राजे को पूर्व सीएम की हैसियत से बंगला नहीं दिया जा सकता है तो उन्हें पांच बार विधायक और दो बार सांसद रहने के नाते बंगाल दिया जा सकता है। नियम बदलने और ऐसे बयानों से साफ जाहिर था कि गहलोत अपनी सरकार में वसुंधरा राजे को उपकृत कर रहे हैं। गहलोत भाजपा नेता राजे को क्यों उपकृत कर रहे हैं इसे भाजपा के नेता अच्छी तरह जानते हैं। राजे के समर्थक विधायक और नेता भाजपा में लगातार असंतुष्ट गतिविधियाँ कर रहे हैं, जिस का फायदा गहलोत सरकारी को मिल रहा है।
निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा को पता है कि सीएम गहलोत की मेहरबानी से ही वसुंधरा राजे बंगला संख्या 13 में जमी हुई है, इसलिए 3 मार्च को लोढ़ा ने वसुंधरा राजे के बंगले का मुद्दा उठाया। लोढ़ा ने गहलोत की दु:खती नस पर हाथ ही नहीं रखा, बल्कि दबाया भी। लोढ़ा ने कहा कि दिल्ली में भाजपा की सरकार ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रियंका गांधी वाड्रा से सरकारी बंगला खाली करवा लिया, जबकि जयपुर में कोर्ट के आदेश के बाद भी कांग्रेस सरकार वसुंधरा राजे से बंगला खाली नहीं करवा रही है। यानि वसुंधरा राजे के बंगले की तुलना लोढ़ा ने प्रियंका वाड्रा के बंगले से कर दी। अब देखना होगा कि संयम लोढ़ा के बदले हुए इस रुख का गहलोत पर क्या असर होता है। जिस प्रकार लोढ़ा का संयम खत्म हो रहा है, उसी प्रकार बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए 6 विधायक भी बैचेन हैं। सचिन पायलट के प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए गहलोत सरकार को मजबूत करने के लिए बसपा के सभी 6 विधायक रातों रात कांग्रेस में शामिल हो गए, लेकिन एक वर्ष गुर्जर जाने के बाद भी विधायक ही बने हुए हैं। मंत्री नहीं बनने से इनमें से कई विधायक बैचेन हो रहे हैं।






