मुंबई (उपसंपादक पंकज तिवारी) – हिन्दू धर्म में नवरात्रि का पर्व काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। एक वर्ष में कुल चार बार नवरात्रि का पर्व आता है परन्तु इनमें से माघ और आषाढ़ नवरात्रि गुप्त नवरात्रि होती है। इनके अलावा चैत्र तथा आश्विन नवरात्रि वह दो नवरात्रि हैं, जिनका हिंदू धर्म में सबसे अधिक महत्व है। चैत्र नवरात्रि के वसंत ऋतु में मनाये जाने के कारण इसे ‘वासंती नवरात्र’ भी कहते हैं। इसके साथ ही इस पर्व का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि चैत्र नवरात्रि के पहले दिन से हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी होती है।
चैत्र नवरात्रि कैसे मनाया जाता है
माँ दुर्गा को समर्पित चैत्र नवरात्रि के इस पर्व को मनाने का एक अलग ही तरीका है, जो इसे अन्य त्योंहारों से भिन्न बनाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हिमांचल प्रदेश, हरियाणा जैसे भारत के उत्तरी राज्यों में यह पर्व काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इसके साथ ही चैत्र नवरात्रि के समय से ही महाराष्ट्र में गुड़ी पाड़वा पर्व की भी शुरुआत होती है।
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन को प्रतिपदा भी कहा जाता है, इस दिन से माँ दुर्गा के मंदिरों में मेलो तथा विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। चैत्र नवरात्रि के शुरुआत से ही दुर्गा मंदिरों में भारी संख्या में भक्तजन दर्शन के लिए आते हैं तथा शक्तिपीठों और प्रसिद्ध देवी मंदिरों में तो यह संख्या लाखों तक पहुंच जाती है।
कलश स्थापना एवं जौ की बुआई
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन घरों में कलश स्थापना की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि कलश को सुख-समृद्धि, वैभव, मंगल कार्यों का प्रतीक माना गया है। कलश स्थापना से पूर्व लोग नहा-धोकर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं ततपश्चात माँ दुर्गा की आराधना करते हुए नवरात्रि कलश की स्थापना करते हैं और दीप तथा धूप जलाकर माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। इसी तरह चैत्र नवरात्रि के अवसर पर कई भक्तों द्वारा अपने घरों में देशी घी की अखंड ज्योति भी जलाई जाती है।
पहला दिन- इस दिन को प्रतिपदा के नाम से जाना जाता है और यह देवी शैलपुत्री को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी को भोग में केला अवश्य अर्पित करना चाहिए।
दूसरा दिन- इस दिन को सिंधारा दौज के नाम से जाना जाता है और यह माता ब्रम्हचारिणी को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ के भोग में देसी घी अवश्य अर्पित करना चाहिए।
तीसरा दिन- इस दिन को गौरी तेज या सौजन्य तीज के नाम से जाना जाता है और यह देवी चंद्रघंटा को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ के भोग में नमकीन मक्खन अवश्य अर्पित करना चाहिए।
चौथा दिन- इस दिन को वरद विनायक चौथ के नाम से जाना जाता है, यह दिन माता कूष्मांडा को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ के भोग में मिश्री अवश्य अर्पित करना चाहिए।
पांचवा दिन- इस दिन को लक्ष्मी पंचमी के नाम से जाना जाता है और यह दिन देवी स्कंदमाता को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ के भोग में खीर या दूध अवश्य अर्पित करना चाहिए।
छठवां दिन- इस दिन को यमुना छत या स्कंद सष्ठी के नाम से जाना जाता है, यह दिन देवी कात्यायनी को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ को भोग स्वरुप माल पुआ अवश्य चढ़ाना चाहिए।
सातवां दिन- इस दिन को महा सप्तमी के रुप में मनाया जाता है और यह दिन देवी कालरात्रि को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ को भोग के रुप में शहद अवश्य चढ़ाना चाहिए।
आठवां दिन- इस दिन को दुर्गा अष्टमी के नाम से जाना जाता है और यह दिन माता महागौरी को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ को भोग के रुप में गुढ़ या नारियल अवश्य अर्पित करना चाहिए।
नौवां दिन- इस दिन को नवमी या रामनवमी के नाम से जाना जाता है और यह दिन देवी सिद्धिदात्री को समर्पित होता है। इस दिन हमें देवी माँ को भोग के रुप में धान का हलवा अवश्य अर्पित करना चाहिए।
कन्या पूजन
नवरात्रि के पर्व में कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। माँ दुर्गा के भक्तों द्वारा अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं की विशेष पूजा की जाती है। इसके अंतर्गत 9 कुंवारी कन्याओं को घर बुलाकर पूरे आदर के साथ उन्हें भोजन कराया जाता है और भोजन के पश्चात उन्हें दक्षिणा और भेंट भी दी जाती है।
मान्यताओं के अनुसार कन्या पूजन द्वारा धन, संपदा, सुख समृद्धि आदि जैसे कई विशेष लाभ मिलते हैं। कन्या पूजन के दौरान कन्याओं को फल, मिठाई, श्रृंगार की वस्तुएं, कपड़े, मिठाई तथा हलवा, काला चना और पूरी जैसे पकवान प्रस्तुत करने की प्रथा है।






