- क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर कारपोरेट घराने किसान की फसल खरीद लेंगे?
- क्या इंस्पेक्टर राज खत्म होने से किसानों को नुकसान होगा?
- क्या कृषि सुधार बिल लाने से पहले सरकार ने किसान संगठनों से बात नहीं की?
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए मोदी सरकार ने तीन बिल लोकसभा में तो पास करवा लिए हैं और अब राज्यसभा में बिलों को पास करवाने का जुगाड़ किया जा रहा है। इस बीच बिलों के प्रावधानों का पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में विरोध हो रहा है। इस विरोध के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने 18 सितम्बर को जो विचार रखे उन्हें मैंने 18 सितम्बर के ब्लॉग में लिखा। मेरे ब्लॉग पर कई लोगों ने आपत्ति की।
मुझे सलाह दी गई कि मैं किसानों की बात भी लिखूं। ऐसी सलाह के आधार पर ही 19 सितम्बर को मैं यह ब्लॉग लिख रहा हंू। मैंने सबसे पहले देश के सबसे बड़े जागरुक नागरिक माने जाने वाले योगेन्द्र यादव के विचार जाने। यादव आंदोलनकारी किसानों के साथ खड़े हैं। यादव का कहना है कि यदि कृषि सुधार वाकई किसानों के हित में है तो फिर किसान संगठनों से वार्ता क्यों नहीं की गई? यादव ने बताया कि वे स्वयं 250 किसान संगठनों से जुड़े हुए हैं, लेकिन मोदी सरकार के किसी भी प्रतिनिधि ने इन 250 संगठनों के प्रतिनिधियों से बात नहीं की। दिल्ली दंगों में योगेन्द्र यादव की भूमिका की चर्चा नहीं करते हुए मैं यह योगेन्द्र यादव द्वारा उठाए मुद्दों को किसानों के सामने रखना चाहता हंू।
सबसे पहला मुद्दा कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग को लेकर है। इसे किसान विरोधी बताया जा रहा है। हम सब जानते हैं कि किसान कितनी मुसीबतों से फसल तैयार करता है। कड़ी मेहनत के बाद जब खेत में फसल लहराने लगती है और किसान खुशहाली के सपने देखने लगता है, तब कोई प्राकृतिक आपदा या टिड्डियों का हमला किसान के सपने पर पानी फेर देता है। ऐसे में यदि शुरुआत में ही फसल का कॉन्ट्रेक्ट हो जाए तो किसान का क्या नुकसान होगा? किसान को तो एक निश्चित राशि मिलेगी ही। जब कोई कारोबारी शुरू में ही अनुबंध करेगा तो किसान को नई तकनीक भी मिलेगी। किसान की फसल का सौदा तो खेत पर ही हो जाएगा। ऐसे में किसान को फायदा ही होगा। जो किसान स्वयं सक्षम होगा, वह खुले बाजार में जाकर अपनी फसल का बेचान कर सकेगा।
नए कानून में यह रूजरी नहीं कि किसान मंडी में जाकर ही अपनी फसल की बिक्री करे। किसान देश के किसी भी क्षेत्र में अपनी फसल बेच सकता है। मौजूदा समय में किसान को मंडियों में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मंडी अधिकारियों की दादागिरी भी समाप्त होगी। किसान चाहे तो अपनी फसल का भंडारण भी कर सकता है। जब गेहूं तिहलन आदि के दाम ज्यादा मिले, तब बिक्री कर सकता है। भंडारण में कोई परेशानी न हो, इसलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम में भी संशोधन किया गया है। अब भंडारण की कोई सीमा नहीं रहेगी। किसान चाहे तो किराए के भंडार गृहों में भी अपना उत्पाद सुरक्षित रख सकता है। आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था को समाप्त कर देगी।
हालांकि इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि एमएसपी व्यवस्था जारी रहेगी। लेकिन सवाल उठता है कि जब किसान को कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग आदि उपायों से एमएसपी से भी ज्यादा कीमत मिलेगी तो फिर किसान मंडी में जाकर फसल को क्यों बेचेगा? जो लोग इन बिलों को लेकर विरोध जता रहे हैं, उन्हें पहले प्रावधानों को समझने की जरुरत है। तर्क दिया जा रहा है कि रिलायंस फ्रेस मार्केट, बिग बाजार, डीमार्ट आदि की वजह से जिस प्रकार किराना स्टोर वाले परेशान है, उसी प्रकार इस कानून से किसान भी परेशान होगा। सब जानते हैं कि जिन किराना स्टोरों ने अपने काम काज को सुधारा उनका महत्व आज भी है। बड़े घरानों की लाख कोशिश के बाद भी किराना का सामान प्रतिमाह पुराने दुकानदार से ही खरीदा जा रहा है। अब दुकानदार भी अपने नियमित ग्राहकों को कम माॢजन पर सामान बेचता है। इससे उपभोक्ता का ही फायदा हुआ है। किसानों को भी कृषि सुधार के उपायो को समझने की जरुरत है। विरोध के लिए विरोध नहीं करना चाहिए। पंजाब और हरियाणा का किसान सरकारी नियंत्रण के दौरान इतना समृद्ध है तो फिर सरकारी नियंत्रण हटने के बाद समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है।







