- आखिर बेजुबान जानवर अपना दर्द किसे बताएं?
- क्या राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत पशुओं की पीड़ा की ओर ध्यान देंगे?
- राजस्थान में चिकित्सा कर्मियों के अभाव में खाली पड़े हैं पशु चिकित्सालय।
- आरपीएससी में फंसी पड़़ी है पशु चिकित्सक पद की भर्ती परीक्षा।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान में कोरोना संक्रमित मरीजों को राहत देने में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन ऐसी संवेदनशीलता और जागरुकता बेजुबान जानवरों के प्रति नहीं दिखाई जा रही है। यही वजह है कि प्रदेशभर के जानवर परेशान हैं। पशुओं के दर्द को समझने वाला कोई नहीं है। पिछले दिनों कोरोना टेस्ट के लिए जब रैपिड किट घटिया आ गए थे तो प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने सीधे केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था, लेकिन जब बेजुबान पशुओं के लिए बाजार में घटिया इंजेक्शन सप्लाई हो गए तो राज्य सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों और अधिकारियों की जुबान भी बंद पड़ी है।
घटिया इंजेक्शन सप्लाई होने की वजह से राज्य सरकार ने 21 सितम्बर से शुरू होने वाला टीका करण अभियान भी रोक दिया है। पशु पालन विभाग के निदेशक डॉ. वीरेन्द्र सिंह ने 18 सितम्बर को आदेश जारी कर प्रदेश की सभी चिकित्सा अधिकारियों से कहा कि मैसर्स ब्रिलिऐंट बायोफार्मा द्वारा सप्लाई वैक्सीन का उपयोग नहीं किया जाए, क्योंकि कुछ वैक्सीन गुणवत्ता के मापदंड पर खरी नहीं उतरी है। राज्य सरकार का यह टीका करण अभियान राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत चलना था। मौसमी बीमारियों से पशुओं को बचाने के लिए यह अभियान केन्द्र सरकार के सहयोग से चलाया जाता है। लेकिन बरसात के बाद यह अभियान राजस्थान में नहीं चल सका। सवाल उठता है कि गरीब पशु पालक अब अपने पशुओं का टीका करण कहां से करवाएगा? संवेदनशील माने जाने वाले सीएम अशोक गहलोत ने अभी तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं की है। पशु विशेषज्ञो का मानना है कि बदलते मौसम में पशुओं का टीका करण जरूरी है। पशु पालकों की ऐसी स्थिति नहीं है कि वे बाजार से महंगा इंजेक्शन खरीद कर पशुओं के लगवाए। राजनीतिक दलों के नेता भी पशुओं की पीड़ा पर चुप है।
नहीं मिल रहा नि:शुल्क दवा का लाभ:
सरकार ने पशुओं के लिए भी नि:शुल्क दवा योजना चला रखी है। लेकिन प्रदेशभर के पशु चिकित्सालयों में चिकित्सा कर्मियों का अभाव है, इसलिए पशु पालकों को नि:शुल्क दवा योजना का लाभ भी नहीं मिल रहा है। पंचायत समिति स्तर के पशु चिकित्सालयों में तो ठेके पर कार्मिक रखे गए हैं। जिन्हें पूरा अनुभव भी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश पशु चिकित्सालय बंद पड़े है। ऐसे चिकित्सालयों को सिर्फ कागजों में दिखाया जा रहा है। तकनीकी चिकित्साकर्मी ही नहीं बल्कि पशु चिकित्सक के भी 60 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं। पशुपालन विभाग में पिछले सात वर्षों से कोई नई भर्ती नहीं हुई है। हालांकि सरकार ने 900 पशु चिकित्सक पदों के लिए भर्ती निकाली है, लेकिन यह भर्ती भी राजस्थान लोक सेवा आयोग में अटकी पड़ी है। डेढ़ माह गुजर जाने के बाद भी परीक्षा की आंसर की तक जारी नहीं हो सकी है। 900 पदों के लिए 2300 अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी है। यह परीक्षा भी लम्बे इंतजार के बाद हुई है। चूंकि यह परीक्षा का मामला भी बेजुबान जानवरों के स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए आयोग के लिए कोई महत्व नहीं रखता। परीक्षार्थी परिणाम के लिए गुहार लगा रहे हैं, लेकिन आयोग में सुनने वाला कोई नहीं है। इस परीक्षा के बारे में और अधिक जानकारी मोबाइल नम्बर 9694005684 पर बेरोजगार संघ के मीडिया प्रभारी डॉ. नरसीराम गुर्जर से ली जा सकती है।







