राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एक स्वायत्त निकाय है, मेरे विभाग का उस पर सीधा नियंत्रण नहीं-शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 26 जून को राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10वीं और 12वीं की बकाया परीक्षाओं को रद्द करने को लेकर बोर्ड अध्यक्ष डीपी जारोली का बयान अखबारों में छपा है। जारोली ने स्पष्ट कहा कि कोरोना संक्रमण के मद्देनजर बोर्ड परीक्षाओं को रदद् करने का निर्णय राज्य सरकार के स्तर पर होगा। बोर्ड अपने स्तर पर परीक्षा रद्द करने का निर्णय नहीं ले सकता है। मालूम हो कि बोर्ड की परीक्षाओं को प्रदेश के 20 लाख विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों में असमंजस की स्थिति है। 25 जून को सीबीएसई ने भी बकाया परीक्षाओं को रद्द कर दिया है। इसके बाद से ही राजस्थान बोर्ड पर परीक्षाओं को रद्द करने का दबाव है। लेकिन बोर्ड अध्यक्ष ने अपनी लाचारी जता दी है कि परीक्षा रद्द करने का निर्णय राज्य सरकार ही लेगी। यहां यह खास तोर पर उल्लेखनीय है कि बकाया परीक्षा शुरू होने से पहले शिक्षा बोर्ड ने सरकार से आग्रह किया था कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए परीक्षा आयोजित नहीं की जाए। सरकार को यह भी सुझाव दिया कि पूर्व में जिन विषयों की परीक्षा ली गई है, उनके प्राप्तांकों का औसत निकाल कर विद्यार्थियों को अंक दे दिए जाएंगे। लेकिन शिक्षा बोर्ड के इस प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में फेंक कर राज्य सरकार ने बकाया परीक्षा करवाने के आदेश दिए। इसलिए अब प्रदेशभर में 12वीं कक्षा की परीक्षाएं हो रही हैं तथा 10वीं की बकाया दो विषयों की परीक्षा 29 व 30 जून को होनी है। 10वीं की परीक्षा में एक साथ 11 लाख परीक्षार्थी भाग लेंगे। हो सकता है कि सीबीएसई की परीक्षा रद्द होने के बाद शिक्षा बोर्ड एक बार फिर परीक्षा रद्द करने के लिए राज्य सरकार के समझ गुहार लगाए।
बोर्ड पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं-डोटासरा:
शिक्षा बोर्ड भले ही स्वयं को राज्य सरकार पर निर्भर बताए, लेकिन प्रदेश के शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि सरकार का बोर्ड पर सीधा नियंत्रण नहीं है। मंत्री ने बोर्ड को एक स्वायत्त निकाय संस्था बताया जो अपने फैसले खुद करती है। डोटासरा का यह बयान 25 जून को टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में छपा है। शिक्षा बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में महाराणा प्रताप की ख्याति का अवमूल्यन किए जाने के संबंध में जब सवाल किया तो डोटासरा ने बोर्ड को स्वायत्त संस्था बता दिया। शिक्षा बोर्ड कितना स्वायत्त है, इसका अंदाजा बोर्ड के अध्यक्ष डीपी जारोली के ताजा बयान से लगाया जा सकता है। वैसे भी सब जानते हैं कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार के बनने पर शिक्षा मंत्री की हैसियत से ही डोटासरा ने पाठ्यक्रम में बदलाव के लिए कोटा विश्वविद्यालय के कुलपति बीएम शर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी की सिफारिश पर ही बोर्ड की पुस्तकों में महाराणा प्रताप की वीरता वाले पाठ घटाए गए तथा हल्दी घाटी के नाम को लेकर भी विवादित टिप्पणियां की गई। सरकार की इस कार्यवाही से अब राजपूत और अन्य समाजों के लोग आंदोलित हैं।
कोई तो गलत बयानी कर रहा है:
पाठकों के सामने शिक्षा मंत्री डोटासरा और बोर्ड अध्यक्ष जारोली के बयान हैं। जाहिर है कि कोई तो गलतबयानी कर रहा है। सवाल उठता है कि पूर्व में जब शिक्षा बोर्ड अध्यक्ष जारोली ने बकाया परीक्षाएं नहीं करवाने का प्रस्ताव किया था, तब राज्य सरकार ने अपनी मजर्मी के अनुरूप् परीक्षा क्यों करवाई? क्या बोर्ड की स्वायत्ता ऐसी ही है? एक ओर बोर्ड के प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में फेंका जा रहा है तो दूसरी तरफ शिक्षा मंत्री बोर्ड की स्वायत्ता की दुहाई दे रहे हैं। चूंकि बोर्ड अध्यक्ष की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है, इसलिए बोर्ड अध्यक्ष भी स्वायत्ता का मतलब अच्छी तरह समझते हैं।

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