- लोकतंत्र का ऐसा उजला चेहरा सिर्फ भारत में ही देखने को मिलेगा।
- कृषि सुधार बिल का विरोध करने वाले सांसद पहले कपिल सिब्बल का बयान सुने।
- विरोध करने वाले नेता किसानों के साथ है या दलालों के?
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 20 सितम्बर को राज्यसभा में विपक्ष के आठ सांसदों ने उपसभापति रघुवंश नारायण सिंह के सामने कृषि सुधार बिल की प्रतियाँ फाड़ी, माइक तोड़ा, ऊंची आवाज में असंसदीय भाषा का प्रयोग किया। रघुवंश के साथ जो कुछ भी हुआ उससे वे बेहद आहत हैं। रघुवंश ने अपनी पीड़ा से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी अवगत कराया है। हालांकि सभापति वैकेंया नायडू ने आरोपी आठों सांसदों को सदन से मानसून सत्र तक के लिए सस्पेंड कर दिया है। इसके विरोध में 21 सितम्बर से आठों सांसद संसद भवन परिसर में धरने पर बैठ गए। जिन सांसदों ने उपसभापति रघुवंश की बेईज्जती की उन्हीं सांसदों के लिए 22 सितम्बर को सुबह रघुवंश चाय लेकर पहुंच गए।
रघुवंश का कहना रहा कि वे अपने शिष्टाचार में कोई कमी नहीं रखना चाहते हैं। चूंकि आठों सांसद उनके अपने हैं, इसलिए चाय लेकर आए हैं। रघुवंश के इस शिष्टाचार से आठों सांसद असमंजस में पड़ गए। सांसदों के पास कहने को कुछ नहीं था। लोकतंत्र की ऐसी उजली तस्वीर सिर्फ भारत में ही देखने को मिल सकती है। मालूम हो कि दो दिन पहले ही रघुवंश को राज्यसभा का दोबारा से सभापति चुना गया है।
रघुवंश जेडीयू के सांसद है। जबकि हंगामा करने वाले डेरेक ब्राउन व डोला सेन टीएमसी, रिपुन बोरा, राजीव सातव व नजीर हुसैन कांग्रेस, केके रागेश व इलायारन सीपीएम तथा संजय सिंह आम आदमी पार्टी के हैं। रघुवंश ने जे शिष्टाचार निभाया, उसी का परिणाम रहा कि आठों सांसदों ने अपना धरना समाप्त कर दिया है। हो सकता है कि सांसदों का निलंबन भी खत्म हो जाए। लेकिन रघुवंश के शिष्टाचार की देशभर में प्रशंसा हो रही है। अपमान करने वालों के प्रति यदि कोई व्यक्ति इतना शिष्टाचार दिखाता है तो यह बहुत बड़ी बात है। कायदे से तो लोकतंत्र का मजाक उड़ाने वालों पर कार्यवाही होनी चाहिए थी, लेकिन रघुवंश ने इसके उलट किया। रघुवंश के इस व्यवहार की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है।
सिब्बल का बयान:
संसद और सड़क पर जो सांसद और नेता कृषि सुधार बिल का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल का बयान सुन लेना चाहिए। सिब्बल का यह वीडियो मेरे फेसबुक पेज www.facebook.com/SPMittalblog पर देखा जा सकता है। यह वीडियो 4 दिसम्बर, 2012 की लोकसभा की कार्यवाही का है। तब सिब्बल केन्द्र में मंत्री थे। तब डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी ऐसे ही सुधर करना चाहती थी, तब लोकसभा में सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सिब्बल ने कहा कि किसान जब अपने खेत से फसल को मंडी तक ले जाता है, तब 35 से 40 प्रतिशत तक फसल खराब हो जाती है। मंडी में किसान को बिचौलियों के शोषण का शिकार होना पड़ता है।
इन बिचौलियों की वजह से ही किसान को फसल की बाजार कीमत की मात्र 17 प्रतिशत राशि ही मिलती है। अब यह विपक्ष को तय करना है कि वह किसानों के साथ है या बिचौलियों के। वर्ष 2012 में सिब्बल ने जो बयान दिया उसका जवाब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को देना है। 2012 में कांग्रेस स्वयं मान रही थी कि मंडी में दलालों का साम्राज्य है। यदि किसान अपनी फसल खुले बाजार में बेचे तो उसे ज्यादा मुनाफा मिलेगा। सवाल उठता है कि जब कांग्रेस की मंशा के अनुरूप ही कृषि क्षेत्र में सुधार किए जा रहे हैं तो फिर कांग्रेस आंदोलन क्यों कर रही है?







