हाथरस घटना की आड़ में उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक दंगे कराने की साजिश का खुलासा। प्रतिबंधित पीएफआई जैसे संगठन सक्रिय।

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  • आखिर किस दिशा में जा रही है देश की राजनीति?
  • राजस्थान पत्रिका की स्पेशल स्टोरी का संज्ञान क्यों नहीं लेती अशोक गहलोत की सरकार?

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – खुफिया एजेंसियों ने खुलासा किया है कि हाथरस की घटना की आड़ में उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक दंगे करवाने की साजिश की गई। जो घटना पिटाई की थी उसे 15 दिन बाद गैंगरेप की घटना बता कर प्रचारित करवाया गया। हालांकि गैंगरेप के आरोपों का सीबीआई की जांच में पता चलेगा, लेकिन पीडि़ता की मृत्यु के बाद जिस तरह रातों रात उत्तर प्रदेश का माहौल बिगाड़ने की कोशिशें की गई, उससे राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। क्योंकि राजनीतिक दलों के नेताओं की उपस्थिति में ही षडय़ंत्रकारियों को अपने मंसूबे अंजाम करने का अवसर मिलता है।

 

नेता इसलिए खुश हो जाते हैं कि भीड़ इक_ी हो गई। हाथरस घटना को लेकर कांग्रेस के राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। अभी यह तो नहीं कहा जा सकता कि राहुल और प्रियंका के समर्थन में जुटी भीड़ में कितने साजिशकर्ता शामिल थे, लेकिन खुफिया एजेंसियों ने न्यूज चैनलों के वो वीडियो जुटाए हैं, जिनसे साजिशकर्ताओं के चेहरे बेनकाब होते हैं। सूत्रों के अनुसार हाथरस की घटना को लेकर रातों रात कई वेबसाइटें बनाई गई और जस्टिस फॉर हाथरस की मुहिम चलाई गई। ऐसी वेबसाइटों पर फर्जी आईडी से हजारों लोग भी सक्रिय हो गए।

 

सोशल मीडिया के प्लेटफार्मों पर बताया गया कि किस तरह उप द्रव करने हैं तथा मास्क लगाकर किस तरह अपनी पहचान छिपानी है। ऐसी वेबसाइटों के दुष्प्रचार का असर भी हुआ। तीन चार दिन तक पूरे उत्तर प्रदेश का माहौल गर्म हो गया। दंगे भड़काने की कोशिशों को तब और बल मिला, जब राजनीतिक दलों के नेता भी सड़क पर उतर गए। पूरा माहौल एक तरफा हो गया। अनेक न्यूज चैनल भी साजिश के शिकार हो गए। हालांकि ऐसे चैनलों को प्रशासन ने धैर्य रखने की सलाह दी थी, लेकिन गांव में प्रवेश और पीडि़ता के परिवार वालों से मिलने की प्रतिस्पर्धा में चैनल वालों ने भी योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

 

यानि साजिशकर्ताओं की योजना के अनुसार काम हो रहा था। सूत्रों के अनुसार प्रतिबंधित पीएफआई जैसे संगठनों के कार्यकर्ता ऐसे माहौल में सक्रिय रहे। अब एक एक षडय़ंत्रों का पता चल रहा है। यह बात भी सामने आ रही है कि जो घटना सिर्फ पिटाई की थी उसे कैसे गैंगरेप में तब्दील कर दिया गया। उत्तर प्रदेश में जो साजिश उजागर हुई, उसे देखते हुए बेहद सतर्कता बरतने की जरुरत है। राजनीतिक दलों के नेताओं को भी सावधानी बरतनी चाहिए।

 

पत्रिका की स्टोरी:
5 अक्टूबर को दैनिक अखबार राजस्थान पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर स्पेशल स्टोरी प्रकाशित हुई है। इस स्टोरी में राजस्थान में पिछले दिनों हुए गैंगरेप की विस्तृत जानकारी है। यह भी बताया गया कि बलात्कार के मामले में राजस्थान पहले नम्बर पर है। स्टोरी में पीडि़त लड़कियों की दर्दभरी कहानी भी बताई गई है। सब जानते हैं कि राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार चल रही है।

 

हाथरस के प्रकरण में सीएम अशोक गहलोत ने भी कई बार अपनी प्रतिक्रिया दी है। सवाल उठता है कि सीएम गहलोत राजस्थान पत्रिका की स्पेशल स्टोरी का जवाब क्यों नहीं देते? क्या पत्रिका में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है वे राजस्थान की नहीं है? सीएम गहलोत को यह भी पता होगा कि राजस्थान पत्रिका कोई साप्ताहिक, पाक्षिक अखबार नहीं है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) की रिपोर्ट के अनुसार पत्रिका अखबार राजस्थान में सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला दैनिक समाचार पत्र है। ऐसे में सीएम गहलोत यह नहीं कह सकते है कि वे राजस्थान पत्रिका को पढ़ते नहीं है। सवाल यह भी है कि बलात्कार के मामले में जो राजनीतिक सक्रियता कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में दिखाई वैसी राजस्थान में क्यों नहीं?

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