- एम्बुलेंस में ऑक्सीजन भी चढ़ रहा है।
- डीसी और कलेक्टर को ऐसी जानलेवा गतिविधियाँ रुकवानी चाहिए।
- चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा के गृह जिले अजमेर के जेएलएन अस्पताल में लचर व्यवस्थाएं।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 9 अक्टूबर को प्रात: 9:30 बजे अजमेर के जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के कोविड-19 के सस्पेक्ट (यूरोलॉजी) वार्ड के बाहर पोर्च का है। इस फोटो में राजस्थान सरकार की एम्बुलेंस बस संख्या आरजे14-पीबी-1031 साफ नजर आ रही है। एम्बुलेंस के स्टे्रचर पर एक मरीज लेटा है तथा उसे ऑक्सीजन भी चढ़ाया जा रहा है। मरीज के पास ऑक्सीजन सिलेंडर भी रखा हुआ है। मरीज का स्टे्रचर एम्बुलैंस से नीचे हैं, जबकि ऊपर की बैंच पर दो महिलाएं तथा तीन पुरुष बैठे हुए हैं। इनमें से एक मरीज बताया जा रहा है।
यानि पूरी एम्बुलेंस मरीज और परिजन से भरी है। छह लोगों के बाद एक और व्यक्ति को एम्बुलेंस में घुसेडऩे की कोशिश की जा रही है। एम्बुलेंस चालक का प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा मरीज और परिजन ठूंस लिए जाए, ताकि दूसरा या तीसरा चक्कर नहीं लगाना पड़े। मरीज और परिजन को बैठाने की ज़िम्मेदारी एम्बुलेंस चालक की है। इस मौके पर सस्पेक्ट वार्ड में नियुक्त चिकित्सक और नर्सिंग कर्मचारी उपस्थित नहीं है। परिजन ही अपने मरीज को वार्ड से एम्बुलेंस तक लाए हैं। सवाल उठता है कि जब मरीज और परिजन को एम्बुलेंस में ठूंसा जा रहा था, तब कोरोना वरियर्स माने जाने वाले चिकित्सा कर्मी कहां थे? सस्पेक्ट वार्ड में उन मरीजों को भर्ती किया जाता है, जिनका कोरोना टेस्ट किया गया है तथा ऐसे मरीज को श्वास लेने में तकलीफ है। मरीज को उसकी स्थिति के अनुरूप सिलेंडर या बाईपेप मशीन से ऑक्सीजन दिया जाता है।
सस्पेक्ट वार्ड में भर्ती जिस मरीज की रिपोर्ट नेगेटिव आती है उसे मेडिकल वार्ड में भेजा जाता है तथा जिस मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है उसे आइसोलेशन वार्ड में भर्ती करवाया जाता है। आरजे14-पीबी-1031 नम्बर वाली एम्बुलैंस मरीजों को मेडिकल और आईसोलेशन वार्डों में ले जाने का काम करती है। सस्पेक्ट वार्ड में मेडिकल और आईसोलेशन वार्ड की दूरी आधा किलोमीटर है, इसलिए एम्बुलैंस का उपयोग होता है। 9 अक्टूबर को सुबह 9:30 बजे इसी एम्बुलैंस से मरीजों और उसके परिजन को भरकर वार्डों में ले जाया जा रहा था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि एम्बुलैंस का सफर कितना जोखिम भरा है।
सस्पेक्ट वार्ड के बाहर ऐसे दृश्य दिन भर देखने को मिलते हैं। पिछले पांच माह से कोरेाना का संक्रमण चल रहा है। अजमेर की मौजूदा डीसी डॉ. आरुषि मालिक और कलेक्टर प्रकाश राजपुरोहित ने कई बार नेहरू अस्पताल का निरीक्षण किया है। ऐसे दौरों के बाद कहा गया कि घंटी बजाते ही या इशारा मिलते ही मरीज के पास चिकित्साकर्मी पहुंच जाएंगे। लेकिन 9 अक्टूबर को ऐसे अफसरों के दौरे और अस्पताल की व्यवस्थाओं की पोल खोलता है।
जिन परिवार वालों के मरीज नेहरू अस्पताल में भर्ती हैं या भर्ती रहे हैं वे बता सकते हैं कि अस्पताल की व्यवस्थाएं कैसी है? अजमेर प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा का गृह जिला है। जब मंत्री के गृह जिले में ही ऐसी व्यवस्थाएं हैं तब अन्य जिलों की व्यवस्थाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है। वैसे भी रघु शर्मा सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाएं सुधारने की फुर्सत ही नहीं है। सवाल उठता है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों की हो रही दुर्दशा का जिम्मेदार कौन हैं? असल में सरकार ने संसाधन तो उपलब्ध करवा रखे हैं, लेकिन इन संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा है।







