(ॲडवोकेट मोहम्मद तारीक सिद्दीकी)
एक बादशाह के दरबार में एक अजनबी नौकरी के लियें हाज़िर हुआ, क़ाबलियत पूछी गई बोला सियासी (अक़्ल और समझबूझ से मसले हल करने वाला) हूँ। बादशाह के पास सियासतदानों की भरमार थी तो उसे वक़्ती तौर पर घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज बना दिया। कुछ दिन बाद बादशाह ने उससे अपने सबसे मंहगे और अज़ीज़ घोड़े के बारे में पूछा, उसने कहा.. “नस्ली नहीं है।”
बादशाह को ताज्जुब हुआ, उसने घोड़े बेचने वाले को तलब किया, उसने बताया के घोड़ा नस्ली है लेकिन उसकी पैदाइश पर उसकी माँ मर गई थी ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला है। सियासी को बुलाया गया.. तुमको कैसे पता चला “असील नहीं है?” बोला.. जब ये घांस खाता है तो गायों की तरह सर नीचे कर के खाता है जबकि नस्ली घोड़ा घांस मुंह में लेकर सर उठा लेता है।
बादशाह उस की परख से बहुत मुतास्सिर हुआ और उसके घर अनाज, घी, चने, और खाने पीने की चीज़ें बतौर इनाम भिजवाईं और उसे मलिका के महल में तैनात कर दिया। कुछ दिनों बाद बादशाह ने उससे बेगम के बारे में राय मांगी, उसने कहा.. तौर तरीकों से मलिका जैसी है लेकिन “शहज़ादी नहीं है।” बादशाह के पैरों तले से ज़मीन निकल गई, हवास बहाल हुए तो सास को बुलवाया, मामला उनसे दरियाफ़्त किया, उसने कहा हक़ीक़त ये है के तुम्हारे बाप ने मेरे ख़ाविंद से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही फ़ौत (मर) हो गई तो हमनें तुम्हारी बादशाहत से क़रीबी ताल्लुक़ात क़ायम रखने के लियें एक बच्ची को गोद ले लिया।
बादशाह ने सियासी से पूछा.. तुम को कैसे इल्म हुआ.. उसने कहा.. उसका ख़ादिमों के साथ सुलूक जाहिलों से बद्तर था, बादशाह उस की परख से बहुत मुतास्सिर हुआ और उसके घर बहुत सा अनाज और भेड़-बकरियां बतौर इनाम भिजवाईं और साथ ही उसे अपने दरबार में तैनात कर दिया। कुछ वक़्त गुज़रा, सियासी को बुलवाया और बादशाह ने अपने बारे में दरियाफ़्त किया, सियासी ने कहा.. जान की अमां पाऊं तो कुछ बोलूं, बादशाह ने जान बख़्शने का वादा किया तो वो बोला.. ना तो आप बादशाह ज़ादे हो और ना ही आप का चाल चलन बादशाहों जैसा है, ये सुनकर बादशाह को बहुत ग़ुस्सा आया लेकिन जान की अमान दे चुका था, सीधा वालिदा के पास पहूंचा, वालिदा ने कहा.. ये सच है! तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हें गोद ले कर पाला।
बादशाह ने सियासी को बुलवाया और पूछा.. बता! तुझे कैसे इल्म हुआ? बोला.. बादशाह जब किसी को इनाम ओ इकराम दिया करते हैं तो हीरे, मोती और जवाहिरात की शक्ल में देते हैं लेकिन आप भेड़, बकरियां और खाने पीने का सामान इनायत करते हैं, ये उसूल बादशाह ज़ादे का नहींबल्कि किसी चरवाहे का हो सकता है। “आदतें नस्लों का पता देती हैं।” आदतें, अख़लाक़ और तर्ज़े अमल ख़ून और नस्ल दोनों की पहचान करा देते हैं।







