- विधायकों की भूमिका से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत क्षुब्ध।
- सचिन पायलट के हटने के बाद कांग्रेस को पहली बार चुनाव का सामना करना पड़ रहा है।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान में जयपुर, जोधपुर और कोटा शहर के 6 नगर निगमों के चुनाव 29 अक्टूबर और 1 नवम्बर को होने हैं। जिन तीन निगमों में 29 अक्टूबर को मतदान होना है, वहां नामांकन की अंतिम तिथि 19 अक्टूबर है। लेकिन 17 अक्टूबर तक भी कांग्रेस के उम्मीदवारों के नाम तय नहीं हुए हैं। उम्मीदवारों के चयन को लेकर 17 अक्टूबर को कांग्रेस के पूर्व महासचिव और वरिष्ठ नेता गिरी राज गर्ग जयपुर में धरने पर बैठ गए हैं।
गर्ग का आरोप है कि विधायकों के दबाव में उम्मीदवारों का चयन हो रहा है। इससे पहले भी 16 अक्टूबर को जब जयपुर के उम्मीदवारों के चयन को लेकर राष्ट्रीय सचिव जयपुर के प्रभारी मंत्री शांति धारीवाल और विधायकों की बैठक हुई तो बैठक में हंगामे की स्थिति देखी गई। इस स्थिति को देखते हुए रात को ही सीएम गहलोत के सरकारी आवास पर आपातकालीन बैठक हुई। जानकार सूत्रों के अनुसार उम्मीदवारों के चयन में विधायकों की भूमिका से सीएम गहलोत क्षुब्ध है। असल में गहलोत ने ही फार्मूला सुझाया था कि जहां कांग्रेस के विधायक हैं, उन वार्डों के उम्मीदवारों के नाम विधायकों से ही लिए जाए। इसी प्रकार गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे नेताओं से ही नाम लिए जाए। लेकिन सीएम के इस फार्मूले को जयपुर के विधायकों ने मानने से इंकार कर दिया।
विधायकों का कहना रहा कि वे अपने क्षेत्र के वार्डों में कांग्रेस के किसी भी कार्यकर्ता को नाराज नहीं कर सकते हैं। इसलिए उम्मीदवारों के चयन की पूरी ज़िम्मेदारी विधायकों पर नहीं डाली जाए। चूंकि जयपुर में दो निगमों में 250 वार्ड हैं, इसलिए सबसे ज्यादा घमासान जयपुर में ही हो रहा है। अब कहा गया है कि पार्षद चुनाव में प्रभारी महासचिव अजय माकन को भी शामिल किया जाएगा। जोधपुर के दोनों निगमों के उम्मीदवारों के चयन की कमान सीएम गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत ने संभाल रखी है। वैभव ने ही गत लोकसभा का चुनाव जोधपुर से लड़ा था। इसी प्रकार कोटा के दोनों निगमों के चुनाव की कमान नगरीय विकास मंत्री शांतिधारीवाल के हाथों में है।
जोधपुर में जहां सीएम गहलोत की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है, तो वहीं कोटा धारीवाल की प्रतिष्ठा दांव पर है। सचिन पायलट के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और डिप्टी सीएम के पद से हटने के बाद यह पहला अवसर है, जब राजस्थान में कांग्रेस को चुनाव का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में सरपंच पद के चुनाव दलीय आधार पर नहीं हुए थे, जबकि पार्षद के चुनाव दलीय आधार पर हो रहे हैं। ऐसे में यह पता चलेगा कि चुनाव में किस दल की जीत अथवा हार हुई है।







