क्या एक मंत्री को एक महिला अधिकारी के खिलाफ ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए?

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  • क्या राजस्थान के नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल स्वयं को मुख्यमंत्री से भी बड़ा समझते हैं?
  • क्या अपने सेवा विस्तार के इंतजार में बैठे मुख्य सचिव राजीव स्वरूप अपनी महिला अधिकारी की रक्षा कर पाएंगे?
  • अजमेर की संभागीय आयुक्त डॉ. आरुषि मलिक के बारे में मंत्री जी के बिगड़े बोल।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 25 अक्टूबर को राजस्थान के न्यूज-18 चैनल पर प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल का एक बयान प्रसारित हुआ है। यह बयान चैनल के रिपोर्टर ने बाक़ायदा माइक लगाकर कर लिया, इसलिए मंत्रीजी को भी पता था कि उनका यह कथन आम जनता में जाएगा। धारीवाल ने यह बयान अजमेर की संभागीय आयुक्त डॉ. आरुषि मलिक के बारे में दिया है।

 

धारीवाल का कहना रहा कि डॉ. मलिक को विवादों में रहने की आदत है। वे अपने अधिकारों से परे जाकर काम करते हैं। डॉ. मलिक को कानून की समझ नहीं है। धारीवाल ने कहा कि उनके अधीन आने वाले स्थानीय निकाय विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार किसी भी संभागीय आयुक्त और जिला कलेक्टर को नहीं है, लेकिन फिर भी अजमेर की संभागीय आयुक्त मलिक ने नागौर की नगर परिषद के आयुक्त जोधाराम विश्नोई के खिलाफ एसीबी को कार्यवाही करने के निर्देश दिए।

 

इतना ही नहीं आयुक्त विश्नोई को कारण बताओं नोटिस भी जारी किया। सवाल उठता है कि मंत्री धारीवाल ने अपनी ही सरकार की एक महिला अधिकारी के खिलाफ जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, वह उचित है? यदि धारीवाल को अधिकारी से कोई शिकायत थी तो वे मुख्यमंत्री से कह कर कार्यवाही करवा सकते थे, लेकिन धारीवाल ने स्वयं ही अधिकारी को कटघरे में खड़ा कर दिया। क्या धारीवाल स्वयं को मुख्यमंत्री से बड़ा समझते हैं? यह माना कि राजस्थान के हाल ही के राजनीतिक घटनाक्रम में धारीवाल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मजबूती के साथ खड़े थे। जब जैसलमेर की होटल में कांग्रेस के विधायक बंधक थे, तब शांति धारीवाल ने ही प्रस्ताव रखा था कि बगावत करने वाले सचिन पायलट को वापस कांग्रेस में नहीं लिया जाए। हो सकता है कि अब मुख्यमंत्री गहलोत तो धारीवाल को कहने की स्थिति में नहीं हो, लेकिन सवाल उठता है कि क्या मुख्य सचिव राजीव स्वरूप अपनी महिला अधिकारी की रक्षा कर पाएंगे? प्रशासनिक ढांचे में आईएस अधिकारी अपना पक्ष मुख्य सचिव के समक्ष ही रखते हैं।

 

इस मामले में डॉ. मलिक ने अपना पक्ष राजीव स्वरूप के समक्ष रखा भी है। राजीव स्वरूप अपनी महिला अधिकारी को कितना बचा पाएंगे, यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन पूरा प्रदेश जानता है कि राजीव स्वरूप को रिटायरमेंट से पहले मुख्य सचिव बनाने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तत्कालीन मुख्य सचिव डीबी गुप्ता को रातों रात हटा दिया था, जबकि गुप्ता की सेवानिवृत्ति में मात्र ढाई माह शेष थे। अब 30 नवम्बर को राजीव स्वरूप भी रिटायर हो रहे हैं। लेकिन सीएम गहलोत ने राजीव स्वरूप के तीन माह के सेवा विस्तार का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेज दिया है। सवाल यही है कि जो मुख्य सचिव अपने सेवा विस्तार के इंतजार में बैठे हैं क्या वे अपनी अधिकारी की रक्षा कर पाएंगे? जहां तक अजमेर की संभागीय आयुक्त डॉ. आरुषि मलिक द्वारा नागौर नगर परिषद के आयुक्त जोधाराम विश्नोई को कारण बताओ नोटिस देने का सवाल है तो डॉ. मलिक ने अपने अधिकार क्षेत्र में ही यह कार्यवाही की है।

 

20 फरवरी 2020 को राज्य सरकार ने आदेश जारी कर क्षेत्रीय अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के अधिकार प्रदेश के सभी संभागीय आयुक्तों को दिए हैं। शायद मंत्री जी को अपनी सरकार के आदेशों की जानकारी नहीं है। डॉ. मलिक ने आयुक्त विश्नोई के खिलाफ अपनी मर्जी या द्वेषतावश नोटिस जारी नहीं किया, बल्कि विश्नोई पर अनियमितताओं के जो आरोप लगे उनकी जांच पहले नागौर के अतिरिक्त कलेक्टर से करवाई गई। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर ही विश्नोई को नोटिस जारी किया गया। डॉ. मलिक ने अतिरिक्त कलेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर ही एसीबी को जांच के लिए पत्र लिखा है। सवाल उठता है कि नगर परिषद के एक आयुक्त के विरुद्ध हुई इस कार्यवाही से नगरीय विकास मंत्री धारीवाल इतने बेचैन क्यों हैं?

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