राजस्थान के 6 नगर निगमों के चुनाव में सीएम अशोक गहलोत का फार्मूला सफल। तीन में कांग्रेस और तीन में भाजपा को बढ़त।

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  • कांग्रेस संगठन के बगैर ही चुनाव में सफलता।
  • सचिन पायलट की भूमिका के बगैर ही हुए चुनाव।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 3 नवम्बर को राजस्थान के जयपुर, जोधपुर और कोटा शहरों के दो-दो नगर निगमों के चुनाव के परिणाम सामने हैं। इन तीनों शहरों में लम्बे समय से भाजपा के बोर्ड बनते रहे हैं। लेकिन इस बार भाजपा की पकड़ को कमजोर करने के लिए सीएम अशोक गहलोत ने अपना फार्मूला लागू किया। इसके अंतर्गत तीनों शहरों में एक के बजाए दो नगर निगम बनाए गए। वार्डों का सीमांकन और मतदाताओं की संख्या को कुछ इस प्रकार रखी गई जो कांग्रेस के पक्ष में मानी जाती है। हालांकि राजनीति में यह सब चलता है।

 

 

गहलोत ने तीनों शहरों के 6 निगमों में जो फार्मूला लागू किया उसी का परिणाम रहा कि अब तीन निगमों में कांग्रेस को बढ़त हासिल हैं। सीएम गहलोत के गृह शहर जोधपुर के उत्तर नगर निगम में तो कांग्रेस का बोर्ड बनना तय हो गया है। 80 वार्डों में से कांग्रेस को 55 वार्डों में जीत हासिल हो गई है। लेकिन जोधपुर दक्षिण नगर निगम में भाजपा को 45 से भी ज्यादा वार्डों में जीत मिली है, इसलिए भाजपा का बोर्ड बनना तय है। चूंकि जोधपुर सीएम गहलोत का गृह शहर है, इसलिए निगम चुनाव की कमान सीएम के पुत्र वैभव गहलोत के पास रही। गत लोकसभा के चुनाव में वैभव गहलोत का मुकाबला भाजपा के गजेन्द्र सिंह शेखावत से हुआ था। शेखावत अब केन्द्र में मंत्री हैं। इसलिए जोधपुर के निगम चुनावों में शेखावत की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई थी।

 

अब शेखावत भी कह सकते हैं कि कांग्रेस का प्रशासन और सीएम का गृह क्षेत्र होने के बाद भी एक नगर निगम भाजपा के पास है। प्रदेश की राजधानी जयपुर में निगम चुनाव को लेकर जबर्दस्त घमासान मचा हुआ था। सौ वार्डों वाले जयपुर हेरीटेज निगम में कांग्रेस का बोर्ड बनने जा रहा है। इसी प्रकार 150 वार्डों वाले जयपुर ग्रेटर के निगम में भाजपा की बढ़त दिख रही है। यानि जोधपुर की तरह जयपुर में भी एक-एक निगम भाजपा और कांग्रेस के हाथ लगेगा। भाजपा ने मुस्लिम बहुल्य 17 वार्डों में मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन जयपुर में भाजपा के सभी 17 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गए। यानि मुस्लिम मतदाताओं ने अपना समर्थन परंपरागत तौर पर कांग्रेस के प्रति ही जताया है।

 

प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल के गृह शहर कोटा के उत्तर नगर निगम में कांग्रेस का बोर्ड बन रहा है। जबकि दक्षिण निगम में कांटे की टक्कर दिख रही है। माना जा रहा है कि निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से कोटा दक्षिण के नगर निगम पर भाजपा का कब्जा हो जाएगा। कोटा से लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला सांसद हैं। कोटा के निगम चुनावों में बिड़ला की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई थी। लेकिन चुनावों में जो मेहनत शांति धारीवाल ने की उतनी मेहनत बिड़ला ने नहीं की। हो सकता है कि धारीवाल कोटा के दोनों निगम में कांग्रेस का मेयर बनवा दें। तीनों शहरों में कांग्रेस और भाजपा के निर्वाचित पार्षदों की बाड़़ाबंदी हो गई है। कोई भी पार्टी मेयर चुनाव तक लापरवाही बरतना नहीं चाहती है। मेयर के चुनाव दस नवम्बर को होंगे। यानि 6 दिनों तक नवनिर्वाचित पार्षद होटलों में रहेंगे।

संगठन के बगैर चुनाव:
सचिन पायलट के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद गोविंद सिंह डोटासरा प्रदेश अध्यक्ष बने थे। लेकिन साढ़े तीन माह गुजर जाने के बाद भी प्रदेश स्तर पर संगठन का ढांचा नहीं बना। यहां तक कि जिला और ब्लॉक कार्यकारिणी भी भंग पड़ी है। संगठन का स्वरूप नहीं होने के बाद भी निगम चुनाव में कांग्रेस ने उम्मीद से ज्यादा सफलता हासिल की है। इसका श्रेय पूरी तरह सीएम गहलोत को जाता है। गहलोत ने टिकिट वितरण से लेकर प्रचार तक की ज़िम्मेदारी कांग्रेस के विधायकों को दी। जिन क्षेत्रों में कांग्रेस के विधायक नहीं थे, वहां गत चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे नेताओ को ही ज़िम्मेदारी दी गई।

 

जयपुर में परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने पूरी ताकत लगा दी। राज्य में कांग्रेस की सरकार होने का फायदा भी कांग्रेस के उम्मीदवारों को मिला। कांग्रेस के विधायकों और नेताओं ने जो सक्रियता दिखाई वैसी सक्रियता भाजपा के विधायक और नेता नहीं दिखा पाए। भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, अयोध्या में राम मंदिर बनवाने जैसे निर्णयों का असर निगम चुनाव पर भी पड़ेगा। शहरी मतदाता भाजपा के पक्ष में ही वोट डालेगा। लेकिन परिणाम बताते है ऐसा नहीं हुआ। निगम चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहने का ख़ामियाज़ा भी भाजपा को उठाना पड़ा। कांग्रेस ने जहां अपने परंपरागत वोटर को मतदान केन्द्र तक पहुंचाया, वहीं भाजपा के नेता ऐसा नहीं कर सके।

 

पायलट के बगैर चुनाव:
सचिन पायलट के प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटने के बाद यह पहला अवसर था जब कांग्रेस को दलीय आधार पर चुनाव का सामना करना था। 6 निगमों के चुनावों में पायलट की भूमिका कहीं भी देखने को नहीं मिली। इन चुनाव परिणामों को लेकर राजनीतिक पंडित कुछ भी कहें लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा के गढ़ माने जाने वाले इन तीनों शहरों में कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है। इन चुनावों के परिणामों पर भाजपा को भी आत्ममंथन करने की जरुरत है। चुनाव परिणामों से सीएम गहलोत के समर्थक उत्साहित हैं।

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