पूर्व मंत्री ललित भाटी ने दबंगता से जी जिंदगी। राजनीति में ऐसे राजनेता कम ही देखने को मिलते हैं।

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अजमेर (एस.पी.मित्तल) – जिले के केकड़ी और दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक रहे पूर्व मंत्री ललित भाटी का शरीर पांच नवम्बर को पंचतत्व में विलीन हो गया। कोरोना संक्रमण की वजह से भाटी की 4 नवम्बर की रात को मृत्यु हो गई थी। भाटी उन राजनेताओं में से रहे जिन्होंने जिन्दगी में कभी कुछ नहीं छिपाया। राजनीति भी दबंगता के साथ की। यदि घर में भी दबंगता दिखाने की जरुरत हुई तो भाटी पीछे नहीं रहे। भाटी का परिवार राजनीतिक पृष्ठभूमि का रहा। एक समय था, जब अजमेर में कांग्रेस की राजनीति भाटी के घर से ही चलती थी।

 

भाटी के पिता शंकर सिंह भाटी लम्बे समय तक शहर कांग्रेस के कोषाध्याष रहे। चूंकि शंकर सिंह भाटी बीड़ी उद्योगपति थे, इसलिए कांग्रेस की आर्थिक मदद करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। शंकर सिंह ने स्वयं तो कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन जब उनका बड़ा बेटा ललित भाटी चुनाव लडऩे के लायक हुआ तो कांग्रेस पार्टी ने पहली बार 1985 में ललित भाटी को केकड़ी से उम्मीदवार बनाया। भाटी ने जीत दर्ज की। फिर 1998 में भाटी ने अजमेर दक्षिण से चुनाव जीता और मंत्री भी बने। सब मानते हैं कि भाटी योग्य राजनेता रहे। विधानसभा में भी भाटी पूरे अध्ययन के साथ बोलते थे।

 

 

जब कभी उनकी बात नहीं मानी जाती थी तो वे खुलकर विरोध भी करते थे। 1998 में जब कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत थे, तब अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद पर डॉ. श्रीगोपाल बाहेती विराजमान रहे। भाटी को पता था कि डॉ. बाहेती गहलोत का संरक्षण है, लेकिन फिर भी भाटी ने नगर सुधार न्यास के कई मामले विधानसभा में उठाए। भाटी ने हर बार अपनी बात को दबंगता के साथ रखा। जब कभी अपनी पार्टी में विरोध करने की जरुरत हुई, तब भाटी ने पुरजोर तरीके से विरोध किया। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में जब अजमेर दक्षिण क्षेत्र से उनके छोटे भाई हेमंत भाटी को कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया तो ललित भाटी ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा।

 

 

20 हजार से भी ज्यादा वोट प्राप्त कर ललित ने अपने भाई हेमंत भाटी को हरवा दिया। पिता शंकर सिंह जी भाटी के निधन के बाद दोनों भाईयों में पारिवारिक मतभेद रहे। शंकर छाप बीड़ी के टे्रडमार्क का मामला हो या पिता की वसीयत का। ललित भाटी ने सभी को लेकर कानूनी लड़ाइयां लड़ी। 2018 में तब के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने एक बार फिर हेमंत भाटी को ही दक्षिण क्षेत्र से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया तो ललित भाटी दोबारा से चुनौती देने का ऐलान कर दिया। ललित का कहना रहा कि किसी को भी उम्मीदवार बनाया जाए, लेकिन हेमंत भाटी नहीं होने चाहिए। बाद में ऐन मौके पर खुद पायलट ने ललित भाटी से बात की। तब रातों रात ललित को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महामंत्री बनाया गया।

 

 

यह बात अलग है कि 2018 में भी हेमंत भाटी की जीत नहीं हो सकी। ललित भाटी अंतिम दिनों तक राजनीति में सक्रिय रहे। यदि कोरोना वायरस का हमला नहीं होता तो ललित भाटी पंचायतीराज के चुनावों में भी सक्रिय नजर आते। राजनीति में ऐसे बहुत से नेता हैं जो कभी बड़े नेताओं का विरोध नहीं करते हैं, लेकिन ललित भाटी ने अपने स्वभाव के मुताबिक राजनीति की और कभी किसी से डरे नहीं। अजमेर की राजनीति खास कांग्रेस की राजनीति में ललित भाटी लम्बे समय तक याद किए जाएंगे। ईश्वर ललित भाटी की आत्मा को शांति प्रदान करें। भाटी अपने पीछे विधवा पत्नी और दो पुत्रों का भरा परिवार छोड़ गए हैं।

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