ओबीसी, जाट और दलित का बनाया कामीनेशन। क्या इस तालमेल से कांग्रेस राजस्थान में अगला चुनाव जीत पाएगी?
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राजनीति का धुर्रंधर खिलाड़ी माना जाता है। गहलोत का हर कदम और निर्णय राजनीति की चतुराई से भरा होता है। सचिन पायलट जब कांग्रेस के 18 विधायको को लेकर एक माह के लिए दिल्ली चले गए तब भी गहलोत ने अपनी सरकार बचा ली।
गांधी परिवार के विश्वास के कारण ही गहलोत तीसरी बार राजस्थान के सीएम बने हुए हैं। पायलट को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद गहलोत ने बड़ी चतुराई से जाट समुदाय के गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त करवा दिया। हाल ही में जब केन्द्र सरकार ने प्रदेश के मुख्य सचिव राजीव स्वरूप का कार्यकाल नहीं बढ़ाया तो नाराज सीएम अशोक गहलोत ने 10 आईएएस की वरिष्ठता की अनदेखी कर दलित वर्ग के आईएएस निरंजन आर्य को मुख्य सचिव बना दिया।
इसे पहले तीन चार आईपीएस के वरिष्ठता लांघकर एमएल लाठर को पुलिस महानिदेशक नियुक्त कर दिया। लाठर भी जाट समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और लाठर की नियुक्ति में प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा की सिफारिश काम आई है। सीएम गहलोत स्वयं ओबीसी वर्ग से आते हैं, हालांकि यह माना जाता है कि संवैधानिक पदों पर बैठने के बाद व्यक्ति को संविधान के अनुरूप ही काम करना होता है, लेकिन जब संवैधानिक पदों पर नियुक्ति का अधिकार किसी राजनेता के पास होता है तो ऐसी नियुक्तियों में राजनीति भी देखने को मिलती है। सीएम गहलोत ने मौजूदा समय में सरकार संगठन और प्रशासनिक तंत्र में जो सोशल इंजीनियरिंग की है, उसमें सामान्य वर्ग गायब है। तीनों अंगों के शीर्ष पदों पर समुदाय विशेष के लोग बैठे हैं। ऐसा नहीं कि इन लोगों की छवि खराब है।
मौजूदा समय में शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों की छवि मिलनसार और साफ-सुथरी है। लेकिन जब ऐसे व्यक्तियों की नियुक्तियां अलग तरीके से होती है तो फिर राजनीति भी देखने को मिलती है। यह माना कि भारत के संघीय ढांचे में मुख्यमंत्री को प्रशासनिक नियुक्तियां करने का पूरा अधिकार होता है, लेकिन जब ऐसी नियुक्तियों में 10-10 आईएएस और आईपीएस की वरिष्ठता लांघी जाए तो फिर सवाल तो उठते ही हैं।
क्या राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग में सामान्य वर्ग का कोई महत्व नहीं है? क्या अशोक गहलोत की इस सोशल इंजीनियरिंग से कांग्रेस राजस्थान में 2023 का विधानसभा चुनाव जीत लेगी? इन सवालों का जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेगा, लेकिन इतना जरूर है कि जो समुदाय जितना संगठित होता है उसका राजनीति पर उतना ही असर ज्यादा होता है। सीएम अशोक गहलोत माने या नहीं, लेकिन जयपुर, जोधपुर और कोटा के नगर निगम में जिस तरह मतदाताओं को बांटकर वार्ड बनाए गए, वो राजनीति का खतरनाक खेल खेला गया है। कांग्रेस अब भले 6 में से चार निगमों में अपना मेयर बनवा ले, लेकिन वार्डों के सीमांकन के परिणाम आने वाले वर्षों में घातक होंगे। इसकी चपेट में खुद कांग्रेस भी आ सकती है। 6 नवम्बर को ही पुलिस प्रोग्रेसिव फोरम के अध्यक्ष मोहम्मद शरीफ ने इस बात पर अफसोस जताया है कि कांग्रेस ने 6 निगमों में से एक में भी मेयर का पद मुस्लिम नहीं बनाया है। जबकि 98 प्रतिशत मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया है।







