सरकारी अस्पतालों में आम मरीज की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश इन्द्रीत महांति गत एक सप्ताह से जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कोरोना वायरस का इलाज करवा रहे थे, लेकिन 7 नवम्बर को जस्टिस महांति अचानक अस्पताल से डिस्चार्ज हो गए। महांति अब किसी निजी अस्पताल में अपना इलाज करवाएंगे। बताया जा रहा है कि एसएमएस अस्पताल की अव्यवस्थाओं से तंग आकर जस्टिस महांति ने डिस्चार्ज हुए हैं। जस्टिस महांति ने अव्यवस्थाओं को लेकर अस्पताल प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था, लेकिन अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
यही वजह रही कि जस्टिस महांति कोरोना का इलाज बीच में ही छोडऩा पड़ा। सवाल उठता है कि जब चीफ जस्टिस को ही समुचित सुविधाएं नहीं मिल रही है, तब कोरोना काल में सरकारी अस्पतालों में भर्ती आम मरीज की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मरीज के परिजन इधर-उधर परिसर में सोते रहते हैं, लेकिन सरकार ने अस्पतालों में कोई सुनवाई नहीं होती। यदि मरीज के परिजन ऊंची आवाज में शिकायत करते हैं तो मरीज को ही परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार का लगातार दावा है कि अस्पतालों में आम मरीज का समुचित इलाज हो रहा है, लेकिन जिन लोगों के परिचित सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए वे बता सकते हैं कि कोरोना संक्रमित मरीज को ट्रॉली पर ले जाने से लेकर शौचालय तक में भी परिजन को ही मशक्कत करनी होती है। मरीज के पेशाब, खून आदि की जांच के लिए भी परिजन को ही भागदौड़ करनी होती है। मरीज की निगरानी पूरी तरह परिजन को ही करनी होती है।
अस्पताल में चिकित्सा कर्मियों का रुखा और सख्त व्यवहार भी मरीज और परिजन को सहन करना पड़ता है। एसएमएस अस्पताल के चिकित्सा कर्मियों को भी पता था कि मरीज इंद्रजीत महांति राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश हैं। लेकिन इसके बाद भी ख्याल नहीं रखा गया। जब मुख्य न्यायाधीश सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाओं से संतुष्ट नहीं है तो फिर आम मरीज की तो बिसात ही क्या है? 7 नवम्बर को जिस तरह जस्टिस महांति सरकारी अस्पताल से डिस्चार्ज हुए उससे पता चलता है कि सरकार की कथनी और करनी में फर्क है। अच्छा हो कि सरकार सरकारी अस्पतालों की दशा को तत्काल सुधारे। कम से कम चिकित्सा कर्मियों को सद्व्यवहार करने की सीख तो दे। जस्टिस महांति भी सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने के लिए स्वैच्छा से भी हाईकोर्ट में सुनवाई कर सकते हैं।







