- कांग्रेस के नवनिर्वाचित 19 विधायकों में से 10 भाजपा और जेडीयू के सम्पर्क में बताए जा रहे हैं।
- कांग्रेस की इतनी बुरी स्थिति कभी नहीं हुई।
- राजस्थान में चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा की स्थिति कमजोर हो सकती है।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में सचिन पायलट के प्रभाव को कम करने में तत्कालीन प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खुद पायलट का आरोप रहा कि कांग्रेस हाई कमान के समक्ष सही स्थिति को नहीं रखा गया। पायलट की बगावत और फिर मेल मिलाप के बाद अविनाश पांडे को राजस्थान के प्रभारी सचिव के पद से हटा कर बिहार का प्रभारी बना दिया गया। तब यही कहा गया कि कांग्रेस हाई कमान की नजर में पांडे की ईमेज अच्छी है, इसलिए चुनाव के मौके पर पांडे को बिहार का प्रभारी बनाया गया है। लेकिन अब परिणाम बताते हैं कि पांडे ने बिहार में कांग्रेस की लुटिया ही डूबो दी। कांग्रेस ने वर्ष 2015 में 27 सीटें प्राप्त की थी, लेकिन इस बार मात्र 19 सीटें मिली हैं।
बिहार विधानसभा में 243 सदस्य है, इसलिए कांग्रेस की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। जबकि इस बार कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था। सूत्रों के अनुसार आरजेडी से पांडे ने ही सौदेबाजी कर 70 सीटें ली। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी ने 144 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार कर 76 सीटें जीती। यदि कांग्रेस कम सीटें लेकर आरजेडी को देती तो आज बिहार में कांग्रेस और आरजेडी के गठबंधन वाली सरकार होती। आरोप तो यहां तक हैं कि बिहार में पैसे लेकर कांग्रेस के उम्मीदवार बनाए गए। राजस्थान के कांग्रेस के अनेक नेता हैं जो अविनाश पांडे की कार्यशैली से परिचित हैं। पांडे की पहल पर ही ऐनमौके पर कांग्रेस के महासचिव रणदीप सुरजेवाला को भी बिहार चुनाव में बुलाया गया। सुरजेवाला ने भी राजस्थान में सचिन पायलट की ईमेज खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
पायलट जब 18 विधायकों को लेकर दिल्ली गए थे, तब सुरजेवाला ने ही पायलट पर कांग्रेस विधायकों को लालच देने का आरोप लगाया। अब अविनाश पांडे की तरह सुरजेवाला भी कांग्रेस नेतृत्व के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं है। राजस्थान के बाद बिहार दूसरा राज्य है, जहां कांग्रेस के नेताओं ने अविनाश पांडे की कार्यशैली की शिकायत की है। असल में अविनाश पांडे और रणदीप सुरजेवाला अपने अपने गृह प्रदेश से उजड़े हुए नेता हैं। पांडे की महाराष्ट्र में और सुरजेवाला की हरियाणा में कोई नहीं सुनता। दोनों ही नेता दूसरे राज्यों में कांग्रेस की स्थिति को लगातार कम कर रहे हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत भले ही अपनी चतुराई से सरकार चला रहे हो, लेकिन सचिन पायलट के अलग थलग होने से कांग्रेस को भारी नुकसान हो रहा है। 21 जिलों में हो रहे पंचायतीराज के चनुाव में पायलट की कमी का अहसास सीएम गहलोत को हो जाएगा।
रघु हो सकते हैं कमजोर:
सब जानते हैं कि प्रदेश की कांग्रेस की राजनीति में चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा का प्रभाव बढ़ाने के लिए अविनाश पांडे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब जब पांडे स्वयं मुसीबत में हैं तो राजस्थान में रघु शर्मा की स्थिति भी कमजोर हो सकती है। जहां तक सीएम गहलोत का सवाल है तो वे रघु शर्मा की मौका परस्ती से पहले ही वाकिफ हैं। वर्ष 2008 से 2013 तक के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में गहलोत रघु की वफादारी देख चुके हैं। यदि सचिन पायलट रघु को अजमेर से लोकसभा का उपचुनाव नहीं लड़वाते तो रघु आज इस स्थिति में नहीं होते। अब पायलट को मात देने में रघु ने कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यह बात अलग है कि रघु की अपने निर्वाचन क्षेत्र केकड़ी (अजमेर) में ही राजनीतिक पकड़ कमजोर होती जा रही है। मंत्री बनने के बाद रघु ने जिस तरह राजनीतिक द्वेषता दिखाई है उससे केकड़ी में भारी नाराजगी है। भले ही लोग अभी चुप हों, लेकिन मौका आने पर सबक सिखाएंगे।







