गुलाम नबी आजाद को अब कश्मीर में हिंदुओं को दोबारा से बसाने में ताकत लगानी चाहिए।

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यह कश्मीर और देश के हित में होगा। आजाद का अब कांग्रेस में कोई भविष्य नहीं।

अजमेर (एस.पी.मित्तल) – 9 फरवरी को राज्यसभा में कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने जो अपना स्वरूप प्रकट किया, उसके बाद अब आजाद का कांग्रेस में कोई भविष्य नहीं बचा है। 9 फरवरी को आजाद का राज्यसभा सदस्य के तौर पर कार्यकाल पूरा हो गया, इसलिए अब वे राज्यसभा में प्रति पक्ष के नेता भी नहीं रहेंगे। आजाद को फिर से राज्यसभा में भेजने का सोनिया गांधी और राहुल गांधी का कोई मन नहीं है। कांग्रेस मल्लिार्जुन खडग़े को राज्यसभा में कांग्रेस दल का नेता बनाने जा रही है।

ऐसे में खडग़े ही प्रति पक्ष के नेता होंगे। खडग़े गांधी परिवार के प्रति वफादार हैं। आजाद ने अपने विदाई भाषण में कश्मीर से हिंदुओं को उजाडऩे पर भी चिंता जताई। उन्होंने माना कि जब वे छात्र राजनीति में थे, तब हिन्दू छात्र छात्राएं उन्हें वोट देते थे। आजाद ने 2005 में गुजराती पर्यटकों की बस पर हुए आतंकी हमले पर भी अफसोस जताया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी माना कि आजाद फोन पर रोए थे। कांग्रेस में रहते हुए आजाद की भले ही कुछ भी सोच रही हो, लेकिन अब जब कांग्रेस में आजाद का कोई भविष्य नहीं बचा है, तब उन्हें एक राष्ट्र भक्त मुसलमान की तरह हिंदुओं को दोबारा से कश्मीर में बसाने के कार्य में भूमिका निभानी चाहिए।

आजाद ने स्वयं माना है कि उन्हें भारतीय मुसलमान होने पर गर्व है। आजाद ने मुस्लिम राष्ट्रों में हो रही जंग पर भी सवाल उठाए हैं। यानि अब आजाद की सोच में बहुत बदलाव है। आजाद भी जानते हैं कि आतंकियों ने हिंदुओं को कश्मीर से पीट पीट कर भगा दिया था। कोई चार लाख हिंदुओं को कश्मीर में अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। आज लाखों हिन्दू कश्मीरी अपने ही देश में शरणार्थी बन कर रहे हैं। ऐसे कश्मीरी विस्थापितों को यदि आजाद दोबारा से कश्मीर में बसाने में सफल होते हैं तो यह कश्मीर और देशहित में भी होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि जम्मू कश्मीर में आजाद का प्रभाव है। यही हिन्दुओं को वापस बसाने का बीड़ा आजाद उठाएंगे तो उन्हें सफलता मिलेगी। आजाद भी जानते हैं कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद जम्मू कश्मीर के हालात बदले हैं। अब अलगावादियों का प्रभाव खत्म हो गया है तथा आतंकवादियों का दबाव भी नहीं है। आतंक ग्रस्त कश्मीर घाटी में हालात सामान्य होने लगे हैं। कश्मीर प्रशासन अपनी ओर से प्रयास कर रहा है। इन प्रयासों में यदि आजाद का सहयोग मिलता है तो यह हिन्दू मुस्लिम भाईचारे को भी मजबूत करेगा। फारूख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला आदि नेताओं की तरह आजाद पर पाकिस्तान का कोई दबाव भी नहीं है, क्योंकि आजाद अपने जीवनकाल में कभी भी पाकिस्तान गए ही नहीं। आजाद का पाकिस्तान के कट्टरपंथी नेताओं से भी कोई संपर्क नहीं है। आजाद यदि हिंदुओं को दोबारा से बसाने का बीड़ा उठाते हैं तो कांग्रेस में रहते की गई गलतियों का प्रायश्चित भी हो जाएगा।

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