सचिन पायलट अब दिल्ली में राहुल गांधी के लिए मुसीबत बनेंगे।

  • इधर राजस्थान में अशोक गहलोत के लिए कांग्रेस की सरकार चलाना मुश्किल।
  • राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती देने वाले युवा कांग्रेसी एकजुट होंगे।
  • भाजपा की पर्दे के पीछे से भूमिका।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 23 जुलाई को कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य और हरियाणा के दिग्गज नेता कुलदीप विश्वनोई ने राज्यसभा सांसद की शपथ ली। शपथ के बाद विश्वनोई ने ट्वीट पर एक फोटो पोस्ट किया। इस फोटो में विश्नोई के अगल बगल में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट खड़े हैं। सब जानते हैं कि सिंधिया और पायलट दोनों ही राहुल गांधी के क्लास फैलों रहे हैं। लेकिन अब ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार पलट कर भाजपा के सांसद के रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं। पायलट के बगावती तेवरों से राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार मुश्किल में है। पायलट के निशाने पर सिर्फ गहलोत सरकार ही नहीं है, बल्कि कांग्रेस में राहुल गांधी का नेतृत्व भी है। सवाल उठता है कि जो पायलट और सिंधिया कभी क्लास फैलों रहे आज वो ही राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती क्यों दे रहे हैं। सिंधिया भले ही भाजपा में चले गए हों, लेकिन पायलट और कुलदीप विश्नोई अभी भी कांग्रेस में बने हुए हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत को लगता है कि सचिन पायलट को एक्सपोज कर उन्होंने बड़ा तीर मार लिया है, लेकिन गहलोत ने अब सीधे राहुल गांधी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। जब कांग्रेस के अंदर ही राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी जाएगी, तब गहलोत को भी अपनी राजनीतिक भूल का अहसास होगा। पायलट के बगावती तेवर के बाद महाराष्ट्र से प्रिया दत्त, मिलिंद देवड़ा, जीतिन प्रसाद जैसे कई युवा कांग्रेसियों ने अफसोस जताया था। गहलोत माने या नहीं, लेकिन पायलट अब कांग्रेस में ही रह कर राहुल गांधी से मुकाबला करेंगे। यानि जो पायलट अब तक गहलोत के नेतृत्व को चुनौती दे रहे थे, वो पायलट अब राहुल गांधी से मुकाबला करेंगे। कुलदीप विश्वनोई के फोटो से पायलट और युवा कांग्रेसियों की मंशा का साफ पता चलता है। गहलोत को लगता है कि विधायकों की खरीद फरोख्त वाले झूठे सच्चे सबूत रख कर वे पायलट को राजनीतिक मात दे देंगे, लेकिन राजनीति के कीचड़ में ऐसे सबूत कोई मायने नहीं रखते हैं।
भाजपा की भूमिका:
सचिन पायलट की बगावत पर अभी तक भाजपा की सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं आई है, लेकिन सवाल उठता है कि भाजपा नैतिकता क्यों दिखाए? जब कांग्रेस के अंदर ही राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी जा रही है तो भजपा पर्दे के पीछे से सक्रिय रहेगी ही। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनीति का मतलब ही क्या है? हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में यदि अशोक गहलोत अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल को खड़े कर सकते हैं, तो पायलट की ओरसे लंदर में बैठकर हरीश साल्वे भी पैरवी कर सकते हैं। केन्द्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल रहे मुकुल रोहतगी भी पायलट के साथ है।

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