अशोक गहलोत को पहले ही समझना चाहिए था कि सचिन पायलट की बगावत को भाजपा का संरक्षण मिलेगा।

  • 10 जुलाई को ही बहुमत साबित करने वाला प्रस्ताव राज्यपाल के पास भेज दिया जाता तो 31 जुलाई को 21 दिन पूरे हो जाते।
  • अब आसान नहीं है विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सरकार का बहुमत साबित करना।
  • पायलट को मिला मायावती का साथ। बसपा विधायकों को लेकर भाजपा विधायक दिलावर ने याचिका दाखिल की।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान विधानसभा का विशेष सत्र बुलााने के लिए 28 जुलाई को तीसरे बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ओर से राज्यपाल कलराज मिश्र को प्रस्ताव भेजा गया है। सत्र बुलाने को लेकर सीएम गहलोत के नेतृत्व में 24 जुलाई को भी राजभवन में पांच घंटे तक धरना प्रदर्शन किया गया था। सब जानते हैं कि गहलोत की रुचि विधानसभा में बहुमत साबित करने के बजाए सचिन पायलट और उनके बागी 18 विधायकों की विधायकी छीनना है। इसके लिए पहले विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी से नोटिस दिलवाए गए, लेकिन जब नोटिसों पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी तो अब विधानसभा के अंदर किसी प्रस्ताव पर मत विभाजन से पायलट गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित करवाने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन इसके लिए राज्यपाल से विधानसभा का सत्र बुलाने की अनुमति लेना जरूरी है। अब सीएम गहलोत कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमितशाह मिलकर उनकी चुनी हुई सरकार गिरा रहे हैं। गहलोत को सचिन पायलट की बगावत के पीछे भी भाजपा और मोदी-शाह हाथ नजर आता है। राजनीति कैसे होती है यह गहलोत अच्छी तरह समझते हैं। छह माह पहले अपी अल्पमत की सरकार को बहुमत में बदलने के लिए बसपा के सभी 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करवा लिया गया। इसलिए गहलोत को पहले ही यह समझना चाहिए था कि सचिन पायलट की बगावत को भाजपा का संरक्षण मिलेगा। यदि भाजपा का संरक्षण नहीं होता तो सीएम गहलोत अपी एसओजी और एसीबी से पायलट गुट के कई विधायकों को गिरफ्तार कर जेल में भिजवा देते। सुरेश टाक जैसे बगावती निर्दलीय विधायकों से तो जेल में चक्की पर गेहंू पिसवाया जाता। भाजपा का संरक्षण नहीं होता तो पायलट गुट के विधायक कहीं भी छिपे होते तो भी गहलोत की एसओजी और एसीबी पकड़ लाती। यदि भाजपा का संरक्षण नहीं होता तो पायलट गुट की ओर से हाईकोर्ट में हरीश साल्वे और मुकुल रोहतगी जैसे नामी वकील भी पैरवी नहीं करते। हरीश साल्वे तो लंदन में बैठकर पायलट की वकालत कर रहे हैं। जब भारत में सुबह की ग्यारह बजती है तब लंदन में रात होती है। यानि हरीश याल्वे जैसा नामी वकील पायलट के लिए रात को भी जागता है। यदि भाजपा का संरक्षण नहीं होता तो अब तक विधानसभा अध्यक्ष भी पायलट के विधायकों को अयोग्य घोषित कर देते। यदि भाजपा का संरक्षण नहीं होता तो विधानसभा का विशेष सत्र भी आहूत हो जाता और गहलोत अपनी मनमर्जी कर लेते। जब गहलोत को कांग्रेस में सबसे मजा हुआ राजनीतिज्ञ माना जाता है, तब इस मुगालते में क्यों रहे कि पायलट की बगावत को भाजपा का संरक्षण नहीं मिलेगा। असल में 25-25 करोड़ रुपए के आरोप लगाकर गहलोत सिर्फ पायलट को बदनाम करने में लगे रहे और भाजपा राजनीति के अनुरूप पायलट को संरक्षण देती रही। गहलोत को जब यह पता था कि राजस्थ्ज्ञान में मध्यप्रदेश की तरह कांग्रेस की सरकार गिराई जा रही है, तब सचिन पायलट की बगावत को हल्के में क्यों लिया गया? यदि गहलोत के रणनीतिकार समझदार होते तो 11 जुलाई को ही सरकार का बहुमत साबित करने वाला प्रस्ताव राज्यपाल के पास भेज दिया जाता। विधानसभा सत्र के लिए 21 दिन के नोटिस वाली अनिवार्यता भी 31 जुलाई को पूरी हो जाती। लेकिन गहलोत और उनके रणनीतिकार पायलट की बगावत को कुचलने में लगे रहे। सवाल उठता है कि जब भाजपा का संरक्षण है तो पायलट की बगावत को आसानी से कैसे कुचला जा सकता है। अब बसपा से आए 6 विधायकों का कानूनी पेच भी फंस गया है। सब जानते हैं कि तब के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट की जानकारी में लाए बगैर ही गहलोत ने सभी 6 बसपा विधायकों को रात के अंधेरे में विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के सामने उपस्थित कर दिया था। इस मौके पर न तो बसपा के प्रदेशाध्यक्ष और न कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष उपस्थित थे। असल में एक पार्टी का दूसरी पार्टी में विलय होता है, तभी विधायक भी दल बदल कानून के दायरे से बच जाते हैं, लेकिन गहलोत ने 6 माह पहले जल्दबाजी में सिर्फ बसपा विधायकों का ही कांग्रेस में विलय करवाया। अब यही कानूनी पेच गहलोत के लिए मूसीबत बन रहा है। यदि बसपा विधायकों पर व्हिप लागू हो गया तो गहलोत को विधानसभा में बहुमत साबित करना मुश्किल होगा। लाख कोशिश के बाद भी पायलट गुट के 19 विधायकों को तोड़ा नहीं जा सका है। उल्टे गहलोत के साथ जो 102 विधायक 10 जुलाई से जयपुर में होटल फेयरमोंट में बैठे हैं उन्हें लेकर अनेक चर्चाएं हैं। आखिर गहलोत कब तक 102 विधायकों को लेकर होटल में बैठे रहेंगे?
पायलट को मिला मायावती का साथ:
सचिन पायलट को अब बसपा सुप्रीमो मायावती का साथ मिल गया है। 28 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती ने कहा कि बसपा के 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। मायावती ने कहा कि बसपा की राजस्थान यूनिट और राष्ट्रीय संगठन ने अभी तक भी विलय को स्वीकृति नहीं दी है। इसलिए सभी छह विधायकों को बसपा का ही विधायक माना गया है। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने हमारे विधायकों को कांग्रेस के विधायक के तौर पर मान्यता देकर असंवैधानिक काम किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने बसपा के साथ धोखाधड़ी की है।
दिलावर ने याचिका दायर की:
28 जुलाई को ही भाजपा विधायक मदन दिलावर ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी है। इस याचिका में बसपा के 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करने के निर्णय को चुनौती दी गई है। दिलावर ने याचिका प्रस्तुत करने के बाद मीडिया से कहा कि विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर मेरी याचिका को खारिज किया है। तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर डॉ. जोशी ने विधानसभा अध्यक्ष के संवैधानिक पद का ख्याल नहीं रखा है। याचिका खारिज करने से पहले मुझे नोटिस भी नहीं दिया गया। मुझे सुने बगैर ही याचिका को खारिज किया गया है। दिलावर ने कहा कि संगठन की सहमति के बिना बसपा के विधायकों को कांग्रेस में शामिल नहीं किया जा सकता है। विधानसभा अध्यक्ष ने बसपा विधायकों को कांग्रेस का सदस्य मानने का जो निर्णय दिया है, वह पूरी तरह असंवैधानिक है। याचिका में मांग की गई है कि बसपा विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाए।

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