- राजस्थान की सम्पूर्ण अफसरशाही जुटी है गहलोत सरकार को बचाने में।
- जैसलमेर के सूर्यागढ़ होटल में इंटरनेट और मोबाइल फोन सेवा भी बाधित।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – लोकतंत्र में माना तो यही जाता है कि सरकारी अमला जनता का नौकर होता है। जनता जो वोट देती है उससे सरकार बनती है और जनता जो टैक्स देती है उससे अधिकारियों को तनख्वाह मिलती है। लेकिन इन दिनों राजस्थान में अफसरशाही अशोक गहलोत की सरकार को बचाने में लगी हुई है। जैसलमेर की जिस सूर्यागढ़ होटल में कांग्रेस और निर्दलीय विधायक ठहरे हुए हैं, उस होटल की सुरक्षा का जिम्मा पूरी तरह गहलोत के विश्वासपात्र अधिकारियों के पास है। कोई विधायक बाहरी व्यक्ति से सम्पर्क नहीं कर सके, इसके पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। भले ही होटल के अंदर पुलिस ने जैमर नहीं लगाए हों, लेकिन जैमर लगे पुलिस के वाहन होटल के अंदर ही खड़े हैं। 7 अगस्त से तो विधायकों के मोबाइल पर इंटरनेट सेवाएं भी बंद हो गई है तथा कॉलिंग में भी बाधा उत्पन्न हो रही है। विधायकों के फोन टेपिंग की बात तो पहले से ही सामने आ रही है। गहलोत सरकार को बनाए रखने में अफसरशाही कोई कसर नहीं छोड़ रही है। डीजीपी भूपेन्द्र यादव के निर्देशों पर जयुपर से कई आईपीएस, आरपीएस और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी जैसलमेर में मौजूद हैं। ऐसे अधिकारियों के पास होटल में बंद विधायकों की पूरी हिस्ट्री है। यदि 14 अगस्त को गहलोत सरकार विधानसभा में बहुमत साबित करने में सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा श्रेय अफसरशाही को जाएगा। कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों को जब जयपुर की होटल फेयरमोंट में 20 दिनों तक रखा गया, तब सीएम गहलोत ने कहा था कि यह राजनीतिक गतिविधि है, इसलिए होटल का किराया प्रदेश कांग्रेस कमेटी वहन करेगी। अब जैसलमेर में जिस तरह के सरकारी इंतजाम हैं उससे जाहिर है कि सब कुछ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में हैं। सवाल उठता है कि जो सरकारी अमला जनता का नौकर है, वह जैसलमेर में सरकार की चाकरी क्यों कर रहा है? जो अधिकारी जैसलमेर में अस्थायी तौर पर तैनात हैं, उनके क्या कोई सेवा नियम नहीं है? आखिर जयपुर के अधिकारी किन नियमों के तहत सूर्यागढ़ होटल की सुरक्षा में जुटे हैं? खबरों के मुताबिक होटल के स्टाफ को प्रभावहीन कर अफसरशाही ने अपने हाथ में होटल का प्रबंधन ले लिया है। अब चूंकि होटल मालिक को भी राजस्थान में ही शराब, बजरी होटल, टोलवसूली का काम करना है, इसलिए आंखें बंद कर रखी है। बताया जा रहा है कि होटल मालिक और उसके परिवार के सदस्यों पर भी होटल जाने पर रोक लगी हुई है। न तो कोई होटल के अंदर जा सकता है और कोई विधायक अपनी इच्छा से बाहर आ सकता है। मीडिया को तो कोई एक किलोमीटर दूर भगा दिया गया है। गहलोत सरकार से सुर मिलाने वाले मीडिया कर्मियों में से ही चुनिंदा विधायकों की मुलाकात होटल के बाहर करवाई जा रही है। ऐसे मीडिया कर्मियों को सवाल भी पहले ही बताए जा रहे हैं। एक भी संवाद ऐसा नहीं होता जो गहलोत सरकार के खिलाफ हो।
तो क्या इसीलिए राजीव स्वरूप को मुख्य सचिव बनाया गया?:
सब जानते हैं कि पिछले दिनों ही डीबी गुप्ता को हटाकर राजीव स्वरूप को प्रदेश का मुख्य सचिव बनाया गया था। यह तब किया गया जब गुप्ता के रिटायरमेंट में मात्र तीन माह शेष थे। गुप्ता को मुख्य सचिव के पद से हटा तो दिया, लेकिन एक माह गुजर जाने के बाद भी पोस्टिंग नहीं दी है। राजीव स्वरूप को भी तब मुख्य सचिव बनाया, जब सेवानिवृत्ति में मात्र चार माह रहे। जिस तरह अफसरशाही गहलोत सरकार को बचाने में लगी हुई है, उससे ही यह सवाल उठता है कि क्या डीबी गुप्ता को हटाकर राजीव स्वरूप को इसीलिए मुख्य सचिव बनाया गया? रातों रात हटाए जाने और फिर पोस्टिंग भी नहीं मिलने के बाद भी गुप्ता की खामोशी आश्चर्यचकित करने वाली है।
भाजपा विधायकों पर नजर:
इसमें कोई दो राय नहीं कि सीएम गहलोत ने अपने समर्थक सभी 100 विधायकों को संभाल कर रखा हुआ है। भले ही इसके लिए पुलिस की मदद से विधायकों को होटलों में बंद रखा गया हो। इसे गहलोत की सफलता ही कहा जाएगा कि बाड़ेबंदी से एक भी विधायक भागने में सफल नहीं हुआ। जयपुर से जैसलमेर भी हवाई जहाज से विधायकों को ले जाया गया। सूत्रों के अनुसार अब सीएम गहलोत की नजर भाजपा विधायकों पर भी लगी हुई है। गहलोत को कितने भाजपा विधायकों का समर्थन मिलता है, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन गहलोत की तीरछी नजर को देखते हुए अब भाजपा भी अपने विधायकों को एकजुट करने में लग गई है।







