- आखिर अडानी पॉवर से क्यो हार गई गहलोत सरकार? क्या गहलोत सरकार भी अडानी से मिली हुई है?
- अब राजस्थान के बिजली उपभोक्ताओं को ख़ामियाज़ा भुगतना होगा।
- 52 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतना करना है।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 1 सितम्बर को राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सुप्रीम कोर्ट में अडानी पॉवर से हार गई है। अब इसका खामियाजा राजस्थान के बिजली उपभोक्ताओं को उठाना पड़ेगा। यदि इस समय प्रदेश में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा की सरकार होती तो अशोक गहलोत सीधा आरोप लगाते कि राजे सरकार अडानी पॉवर से मिली हुई है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी तरीके से पैरवी नहीं की गई। यदि सरकार मजबूती के साथ अपना पक्ष रखती तो अडानी की जीत नहीं हो सकती थी। लेकिन अब जब एक सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में गहलोत सरकार की हार हो गई है, तब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। सवाल उठता है कि क्या गहलोत सरकार भी अडानी जैसे उद्योगपति से मिली हुई है? अशोक गहलोत की छवि को देखते हुए लगता है कि सरकार की सांठगांठ अडानी से हैं, लेकिन यह सच है कि अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए सुप्रीम कोर्ट में अडानी की जीत हो गई है। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी प्रतिदिन आरोप लगाते हैं कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार अडानी और अम्बानी पर मेहरबान है। ये दोनों औद्योगिक घराने ही मोदी सरकार को चला रहे हैं। लेकिन अब राहुल गांधी को बताना चाहिए कि कांग्रेस की सरकार होते हुए भी राजस्थान में अडानी की जीत कैसे हो गई? यदि पिछली भाजपा सरकार ने अडानी पॉवर के साथ कोई जनविरोधी समझौता कर लिया है तो मुख्यमंत्री बनने के बाद अशोक गहलोत ने ऐसे समझौते को रद्द क्यों नहीं किया? आखिर अडानी पॉवर के साथ गहलोत सरकार क्यों नरम रुख अपना रही है? सब जानते हैं कि वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री रहते हुए अडानी पॉवर से बिजली खरीदने का अनुबंध किया था। इस अनुबंध के मुताबिक बिजली के लागत मूल्य में किन्हीं कारणों से वृद्धि होगी तो बिजली की बिक्री दर भी बढ़ जाएगी। चूंकि कोयले की कीमतों में वृद्धि हो गई, इसलिए अडानी पॉवर ने राजस्थान में सप्लाई होने वाली बिजली की दर भी बढ़ा दी। हालांकि सरकार ने अडानी के फैसले को आरईआरसी एपिलिएट ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, लेकिन यहां भी फैसला अडानी के पक्ष में रहा। ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद ही गहलोत सरकार ने अडानी को 27 हजार करोड़ रुपए देने पर सहमति जताई। अब इस राशि की भरपाई राजस्थान के बिजली उपभोक्ताओं से की जा रही है। उपभोक्ताओं से प्रति यूनिट 5 पैसे अतिरिक्त वसूली हो रही है। अडानी 27 हजार करोड़ रुपए देने के लिए 36 माह तक उपभोक्ताओं को अतिरिक्त चार्ज देना होगा। अब जब सुप्रीम कोर्ट से भी अडानी के हक में फैसला आ गया है तो आने वाले दिनों में उपभोक्ताओं और भार पड़ेगा। माना जा रहा है कि सरकार को 52 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान अडानी को करना पड़ेगा। इस राशि की भरपाई भी उपभोक्ताओं से ही होगी। सवाल उठता है कि गहलोत सरकार अडानी पॉवर की मनमानी शर्तों को क्यों मान रही है? उस समझौते को रद्द क्यों नहीं किया जाता जो वसुंंधरा राजे की भाजपा सरकार ने किया था? आखिर महंगी दर पर अडानी से बिजली क्यों खरीदी जा रही है?







