आखिर कौन सच बोल रहा है राजस्थान पत्रिका या दैनिक भास्कर।

  • ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) क्या राजस्थान के पाठकों को बेवकूफ समझता है?
  • गिरगिट की तरह रंग बदलने से ब्यूरो की ईमेज भी खराब हो रही है।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 3 सितम्बर को राजस्थान पत्रिका ने अपने प्रथम पृष्ठ पर दावा किया है कि राजस्थान में पत्रिका अखबार ही पहले नम्बर पर है। पत्रिका की प्रतिदिन 16 लाख 51 हजार 764 प्रतियां प्रकाशित होती है जो दैनिक भास्कर से 19 हजार 392 प्रतियां अधिक हैं। यानि राजस्थान में भास्कर की प्रतियां 16 लाख 44 हजार ही है। प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित विज्ञापन में दावा किया गया कि पत्रिका ही कल भी प्रथम था और कल भी रहेगा। अखबार पढऩे वाले पाठकों को याद होगा कि कोई 15 दिन पहले तक भास्कर की ओर से दावा किया जा रहा था कि भास्कर अखबार ही राजस्थान में पहले नम्बर पर है। तब भास्कर ने पत्रिका की प्रतियां कम बताई थी। कोई एक माह तक अभियान चला कर भास्कर ने अपने प्रतिद्वंद्वी राजस्थान पत्रिका को दूसरे नम्बर पर बताया। भास्कर का दावा रहा कि अब राजस्थान में पहले नम्बर का कोई भ्रम नहीं है। भास्कर का जब एक महीने तक पहले नम्बर का अभियान चला, तब पत्रिका ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। लेकिन अब 3 सितम्बर को पत्रिका का दावा है कि भास्कर नहीं पत्रिका अखबार राजस्थान में पहले नम्बर पर है। पत्रिका और भास्कर माने या नहीं, लेकिन राजस्थान का पाठक असमंजस में है कि किसे पहले नम्बर पर माने। हालांकि आम पाठक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पहले नम्बर पर कौन सा अखबार है। पाठक को तो चार रुपए पचास पैसे प्रतिदिन खर्च कर अखबार पढऩा पड़ता है। जो अखबार पसंदीदा होता है उसी पर साढ़े चार रुपए खर्च किए जाते हें। प्रसार संस्था का असर विज्ञापन दाता पर पड़ता है। जो विज्ञापन दाता लाखों रुपए खर्च करता है वह यह जरुर देखता है कि किस अखबार का सर्कुलेशन ज्यादा है। अब सवाल उठता है कि भास्कर और पत्रिका किस आधार पर प्रथम स्थान पर होने का दावा करते हैं? पाठकों ने देखा होगा कि दोनों ही अखबार ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की जांच पड़ताल को अपने दावे का आधार बताया। अब सवाल यह भी उठता है कि क्या ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन राजस्थान के पाठकों को बेवकूफ समझता है? कभी भास्कर की प्रतियां ज्यादा बताता है तो कभी राजस्थान पत्रिका की। क्या ब्यूरो के अधिकारी दिन भर सिर्फ पत्रिका और भास्कर की प्रतियों की जांच पड़ताल का ही काम करते हैं? जब भास्कर की संख्या अधिक बताई जाती है तो भास्कर प्रबंधन की उछलकूद देखने को मिलती है और जब पत्रिका को आगे बताया जाता है तो पत्रिका के नए नए अंदाज देखने को मिलते हैं। 3 सितम्बर को पत्रिका ने दावा किया कि एबीसी ने वर्ष 2019 में जुलाई से दिसम्बर माह के संशोधित आंकड़े जारी किए हैं, उसी में पत्रिका की भास्कर से 19 हजार 392 प्रतियां ज्यादा बताई गई। यानि पूर्व में एबीसी ने जो भास्कर के लिए रिपोर्ट जारी की थी वह सही नहीं थी। अब इस बात की क्या गारंटी है की ताजा रिपोर्ट सही होगी? अब जब पत्रिका स्वयं को पहले नम्बर पर बताएगा तो भास्कर चुप तो नहीं रहेगा। जब पत्रिका के लिए संशोधित रिपोर्ट जारी हो सकती है तो भास्कर के लिए पुन: संशोधित रिपोर्ट क्यों नहीं? एबीसी माने या नहीं, लेकिन इससे उसकी इमेज खराब हो रही है। प्रतिस्पर्धा की वजह से अखबारों का भी बुरा हाल है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here