- मुझे एसीबी ने झूठा फँसाया है-कुलपति आरपी सिंह।
- भ्रष्टाचार में कुलपति की भी भूमिका-एडीजी दिनेश एनएम
- यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक सुब्रत्तोदत्ता भी तलब।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 7 सितम्बर को रिश्वत खोरी के एक मामले में अजमेर स्थित एमडीएस यूनिवर्सिटी के कुलपति आरपी सिंह और दो दलालों की गिरफ्तारी हुई थी। कुलपति की गिरफ्तारी की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 8 सितम्बर को एसीबी के एडीजी दिनेश एनएम ने अजमेर पहुंच गए। गिरफ्तार दलाल रणजीत सिंह चौधरी और कुलपति आरपी सिंह से एडीजी दिनेश ने स्वयं पूछताछ की है। जानकार सूत्रों के अनुसार एडीजी की ओर से आरपी सिंह को बताया गया कि कॉलेजों को मान्यता देने और अन्य मामलों में किस तरह से सौदेबाजी हो रही थी। चूंकि कुलपति के दलाल रणजीत चौधरी का मोबाइल फोन जयुपर में ही सर्विलांस पर रखा गया था। इसलिए सारी जानकारी जयपुर में ही एकत्रित की गई। हालांकि इससे पहले आरपी सिंह का कहना रहा कि एसीबी ने उन्हें झूठा फंसाया है। एसीबी ने जिस रणजीत सिंह चौधरी को रिश्वत की राशि के साथ गिरफ्तार किया है, उससे मेेरा कोई संबंध नहीं है। चौधरी के अपराध में मैं शामिल नहीं हंू। वहीं एसीबी को अब तक जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार यूनिवर्सिटी के कई अधिकारी भी भ्रष्टाचार में शामिल हैं। यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक सुब्रत्तोदत्ता को एसीबी ने तलब किया है। मालूम हो कि आरपी सिंह अजमेर में कुलपति बनने से पहले उत्तर प्रदेश में मेरठ यूनिवर्सिटी और राजस्थान में जोधपुर स्थित जय नारायण यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रह चुके हैं।
बड़े भ्रष्टाचारियों की भी हो गिरफ्तार:
7 सितम्बर को दोपहर को जब अजमेर स्थित एमडीएस यूनिवर्सिटी के कुलपति आरपी सिंह अपने सरकारी आवास में नीचे के कमरे में सो रहे थे, तब ऊपर के कमरे में निजी ड्राइवर रणजीत सिंह चौधरी दो लाख 20 हजार रुपए की रिश्वत ले रहा था। अब कुलपति और ड्राइवर दोनों ही एसीबी की गिरफ्त में है। एसीबी ने जिस तकनीक से कुलपति को पकड़ा है, उसी तकनीक से राजस्थान के बड़े भ्रष्टाचारी भी पकड़े जा सकते हैं। कुलपति की गिरफ्तारी के प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि एसीबी के पास कोई शिकायत कर्ता नहीं था। एसीबी को गत जून माह में भीलवाड़ा के एक निजी कॉलेज के संचालक ने शिकायत की थी कि मान्यता देने के लिए रिश्वत मांगी जा रही है। इस पर एसीबी ने जांच पड़ताल की तो कुलपति के ड्राइवर रणजीत सिंह की भूमिका दलाल के तौर पर सामने आए। इस पर रणजीत का मोबाइल सर्विलांस पर रखा गया। रणजीत के मोबाइल से ही पता चला कि अधिकांश निजी कॉलेजों से रिश्वत मांगी जा रही है। चूंकि रणजीत के मोबाइल पर होने वाली बातें एसीबी सुन रही थी, इसलिए यह पता चला कि 7 सितम्बर को दोपहर को नागौर के झूंझाला स्थित इंजीनियर राहुल मिर्धा कॉलेज का प्रतिनिधि महिपाल दो लाख 20 हजार रुपए की राशि देने आएगा। यह महत्वपूर्ण जानकारी एसीबी के जयपुर स्थित अधिकारियों के पास थी, जिसे ऐनमौके पर अजमेर के अधिकारियों से सांझा किया गया, जयपुर की टीम के साथ अजमेर के डीएसपी महिपाल चौधरी भी थे। चूंकि कुलपति आवास का मुख्यद्वार बंद था, इसलिए डीएसपी महिपाल को फोन कर प्रवेश करना पड़ा। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि संबंधित कॉलेज ने रिश्वत मांगने की कोई शिकायत एसीबी में दर्ज नहीं करवाई थी। इसलिए एसीबी ने कॉलेज के प्रतिनिधि महिपाल को भी रिश्वत देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। जब एसीबी बगैर शिकायत के कुलपति जैसे व्यक्ति को रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार कर सकती है, तब बड़े भ्रष्टाचारियों को भी पकड़ा जाना चाहिए। एसीबी रणजीत सिंह चौधरी जैसे अनेक दलालों को पकड़ती है, लेकिन दलालों से जुड़े भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसा जाता। यदि दलाल के सम्पर्क में आए अधिकारी को भी गिरफ्तार कर लिया जाए तो सरकारी दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है। जिन लोगों का काम सरकारी दफ्तरों में पड़ता है, उन्हें पता है कि भ्रष्टाचार की स्थिति क्या है। एक टेबल से दूसरी टेबल तक फाइल पहुंचाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। हालांकि राजस्थान में एसीबी सराहनीय कार्य कर रही है। लेकिन यदि कुलपति आरपी सिंह की तरह बड़े अधिकारियों को पकड़ लिया जाए, तो आम लोगों को राहत मिल सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जायज काम भी संबंधित अधिकारी नहीं करते हैं। यदि बड़ा अधिकारी जायज काम कर दे तो नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार रुक सकता है। जहां तक जनप्रतिनिधियों का सवाल है तो अधिकांश जन प्रतिनिधियों की भूमिका भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली होती है।







