कांग्रेस के ताजा पुनर्गठन में राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत की चली; सचिन पायलट फिर खाली हाथ।

सचिन पायलट की बगावत के समय गहलोत को
सहयोग करने वाले नेताओं को तरक्की।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – कहने को तो श्रीमती सोनिया गांधी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हैं, लेकिन वे स्थायी अध्यक्ष से भी ज्यादा प्रभावी निर्णय ले रही हैं। 11 सितम्बर को सोनिया गांधी ने संगठन का जो पुनर्गठन किया उससे यह प्रतीत होता है कि गांधी परिवार के सदस्यों की कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले नेताओं का कांग्रेस में कोई स्थान नहीं है, भले ही पहले कितना भी वफादार रहा हो। कांग्रेस में रहना है तो नेताओं को हर बार गांधी परिवार के प्रति वफादारी दिखानी होगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गुलामनबी आजाद हैं।
कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले आजाद से अभी कांग्रेस महासचिव का पद छीना गया है। आने वाले दिनों में राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता का पद भी छीन लिया जाएगा। आजाद को किसी राज्य से राज्यसभा में भी नहीं भेजा जाएगा। असल में 11 सितम्बर को सोनिया गांधी ने जो पुनर्गठन किया उसमें राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत की चली है। संगठन का पुनर्गठन राजस्थान में जुलाई अगस्त में हुए राजनीतिक घमासान से भी जुड़ा हुआ है। सचिन पायलट की बगावत के समय जिन नेताओं ने गहलोत को सहयोग किया, उनकी खूब तरक्की हुई है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण रणदीप सुरजेवाला और विवेक बंसल हैं। सुरजेवाला को प्रवक्ता से सीधे सोनिया गांधी का सलाहकार बना दिया गया है। इतना ही नहीं सुरजेवाला अब कर्नाटक के प्रभारी भी होंगे। विवेक बंसल को हरियाणा का प्रभारी बनाया गया है। बंसल अभी तक राजस्थान के सहप्रभारी थे। सचिन पायलट गुट ने भले ही बंसल पर गंभीर आरोप लगाए हों, लेकिन गहलोत की सिफारिश पर बंसल की तरक्की हो गई है।
पायलट की बगावत के समय गहलोत के साथ खड़े रहने वाले भंवर जीतेन्द्र सिंह को राष्ट्रीय महासचिव का पद देने के साथ साथ कांग्रेस की सेंट्रल वर्किंग कमेटी का सदस्य भी बनाया गया है। इतना ही नहीं जीतेन्द्र को असम का प्रभारी भी नियुक्त किया है। गहलोत ने अपने एक और भरोसेमंद नेता पूर्व सांसद रघुवीर मीणा को सीडब्ल्यूसी का स्थायी सदस्य बनवा दिया है। बगावत के समय बांगड़ क्षेत्र के विधायकों को एकजुट करने में मीणा की भूमिका रही। यहां तक कि भाजपा के विधायक भी इधर उधर कर दिए गए। पुनर्गठन के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन में अशोक गहलोत की स्थिति और मजबूत हो गई है। अब राहुल गांधी भी गहलोत पर पूरा भरोसा करते हैं।
पायलट फिर खाली हाथ:
बगावत के बाद प्रदेशाध्यक्ष और डिप्टी सीएम का पद गवाने वाले सचिन पायलट पुनर्गठन में भी खाली हाथ रहे हैं। पायलट को सहयोग करने वाले किसी भी नेता को महत्व नहीं मिला है। पायलट अब प्रदेश की राजनीति में सिर्फ एक विधायक की हैसियत रखते हैं। जन्मदिन पर प्रदेशभर में रक्तदान शिविर लगाने तथा शक्ति परीक्षण करने के बाद भी पायलट को कोई तवज्जों नहीं दी गई है। गहलोत की कार्यशैली से प्रतीत होता है कि अब पायलट को और संघर्ष करना पड़ेगा। पायलट के समर्थकों की नाराजगी प्रभारी महासचिव अजय माकन के संभाग स्तर संवाद में भी देखने को मिल रही है। लेकिन ऐसे दबावों का भी राष्ट्रीय नेतृत्व पर असर नहीं पड़ा है। अगस्त में पायलट की वापसी के समय जिस तीन सदस्सीय कमेटी का गठन किया गया था, उसकी पहली बैठक भी नहीं हुई है। अब देखाना होगा कि पायलट कांग्रेस में अपना वजूद कैसे कायम रखते हैं।

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