- ओम थानवी के बाद अब एनडीटीवी के पत्रकार रविश कुमार भी राजस्थान में किसी यूनिवर्सिटी के कुलपति बन सकते हैं।
- यूनिवर्सिटी का कुलपति बनने के लिए 10 वर्ष प्रोफेसर रहने की अनिर्वायता है
- अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए एमकॉम उत्तीर्ण भी तीन यूनिवर्सिटी का कुलपति बन सकता है।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 23 सितम्बर को वरिष्ठ पत्रकार रहे आम थानवी को अजमेर स्थित एमडीएस यूनिवर्सिटी के कुलपति का पदभार संभाल लिया। थानवी का कहना है कि इस यूनिवर्सिटी पर भ्रष्टाचार होने के जो दाग लगे हैं, सबसे पहले उन्हें साफ किया जाएगा। थानवी को इस यूनिवर्सिटी का अतिरिक्त चार्ज दिया गया है। हालांकि थानवी शिक्षाविद होने की योग्यता नहीं रखते हैं, लेकिन पत्रकारिता में उनके अनुभव और विचारधारा को देखते हुए तीन लाख विद्यार्थियों की परीक्षा लेने और प्रदेश के करीब तीन सौ कॉलेजों को मान्यता देने वाली एमडीएस यूनिवर्सिटी का कुलपति बना दिया गया है।
मौजूदा समय में थानवी जयपुर स्थित हरिदेव जोशी पत्रकारिता यूनिवर्सिटी के स्थायी कुलपति हैं। इस यूनिवर्सिटी में मुश्किल से 120 विद्यार्थी होंगे। चूंकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की नजर में ओम थानवी अच्छे पत्रकार रहे, इसलिए कुछ दिनों पूर्व ही उन्हें राजस्थान आईएलडी कौशल विकास यूनिवर्सिटी का भी अतिरिक्त चार्ज दिया गया। यानि इस समय ओम थानवी तीन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर है। जनसत्ता अखबार के सम्पादक रहे ओम थानवी की सफलता को देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि एनडीटीवी के पत्रकार रविश कुमार को भी राजस्थान की किसी यूनिवर्सिटी का कुलपति बनाकर उपकृत किया जा सकता है। जब ओम थानवी तीन यूनिवर्सिटी के कुलपति बन सकते हैं तो रविश कुमार तो 6 यूनिवर्सिटी के कुलपति बनने की योग्यता और क्षमता रखते हैं। ओम थानवी तो वर्षों पहले जनसत्ता के सम्पादक रहे, लेकिन रविश कुमार तो अभी भी एनडीटीवी के स्टार पत्रकार हैं। सीएम अशोक गहलोत स्वयं रविश कुमार की पत्रकारिता के प्रशंसक हैं। गहलोत ने कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंसों में रविश की पत्रकारिता की प्रशंसा की है। लोगों को एनडीटीवी देखने की भी सलाह दी है।
अशोक गहलोत जब किसी पत्रकार पर मेहरबान हों तो फिर यूनिवर्सिटी के कुलपति की योग्यता और शैक्षिक पात्रता भी कोई मायने नहीं रखती। गत विधानसभा सत्र में ही गहलोत सरकार ने कानून बनाया कि यूनिवर्सिटी के कुलपति के लिए कम से कम 10 वर्ष का प्रोफेसर का अनुभव जरूरी है। यानि जो शिक्षाविद् किसी यूनिवर्सिटी में 10 वर्ष प्रोफेसर के पद पर काम कर चुका होगा, उसे ही कुलपति बनाया जा सकता है। इस कानून को लाते वक्त गहलोत सरकार ने तर्क दिया कि पिछले भाजपा सरकार ने शैक्षिक योग्यता और अनुभव की अनदेखी कर यंू ही कुलपति बना दिए। गहलोत सरकार ने भले ही ओम थानवी को एमडीएस यूनिवर्सिटी के कुलपति का अतिरिक्त चार्ज दिया हो, लेकिन सरकार जब तक चाहे तब तक ओम थानवी को इस यूनिवर्सिटी के कुलपति के पद पर टिकाए रख सकती है।
किसी भी यूनिवर्सिटी का कुलपति नियुक्त करना सरकार के हाथ में ही होता है। हालांकि कुलपति की नियुक्ति के आदेश पर राज्यपाल के हस्ताक्षर होते हैं, लेकिन राजभवन भी ऐसे आदेश सरकार की सिफारिश पर जारी करता है। मौजूदा राज्यपाल कलराज मिश्र नहीं चाहते हैं कि सीएम अशोक गहलोत के नेतृत्व में दोबारा से राजभवन में धरना प्रदर्शन हो। इसलिए राज्यपाल ने भी अब गहलोत सरकार की सिफारिशों को मानना ही उचित समझते हैं। यदि ओम थानवी को राजस्थान लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाने की सिफारिश आएगी तो राज्यपाल उसे भी स्वीकार कर लेंगे। राज्यपाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ओम थानवी सिर्फ एमकॉम उत्तीर्ण हैं। जब सीएम अशोक गहलोत सिफारिश करेंगे तो एमकॉम उत्तीर्ण पत्रकार को भी राजस्थान लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बना देंगे। अलबत्ता ओम थानवी की सफलता से पत्रकार जगत में हर्ष का माहौल है, क्योंकि अब संवैधानिक पदों पर पत्रकार साथी नियुक्त हो सकते हैं। इसमें कोईदो राय नहीं कि ओम थानवी को पत्रकारिता का लम्बा अनुभव रहा है। 1957 में जन्में 64 वर्षीय ओम थानवी राजस्थान पत्रिका अखबार में भी काम कर चुके हैं। इंडियन एक्सप्रेस समह के हिन्दी अखबार जनसत्ता के चंडीगढ़ संस्करण के सम्पादक भी रहे हैं। ओम थानवी का हिन्दी भाषा पर पूरा नियंत्रण है।







