जब राजनेता वोट के लिए बीज बोएंगे तो फिर कांटों वाली फसल ही उगेगी।

  • राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र डूंगरपुर में सामान्य वर्ग की सीटों पर जनजाति के अभ्यर्थियो को नौकरी देने की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन।
  • कांटों की फसल के लिए भाजपा और कांग्रेस एक समान।
  • विधायकों की ताजा बाड़ाबंदी में डूंगरपुर की खास भूमिका रही थी।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 25 सितम्बर को भी राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र डूंगरपर के नेशनल हाईवे आठ पर तनावपूर्ण हालात रहे। एक दिन पहले क्षेत्र के युवाओं ने एसपी की जीप जला दी। पुलिस को पांच किलोमीटर खदेड़ दिया। एएसपी को अपनी जान बचाने के लिए ट्रक के पीछे लटकना पड़ा। आदि वासियों में शामिल असामाजिक तत्वों ने मौके का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आदिवासी क्षेत्र के युवाओं की मांग है कि अध्यापक पात्रता परीक्षा 2018 (रीट) में जनजाति उप योजना क्षेत्र में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की जो 1167 सीटें रिक्त पड़ी हैं, उन पर जनजाति के अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी जाए।
यह मांग तब की जा रही है, जब हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट कहा है कि सामान्य वर्ग के रिक्त पदों पर अन्य आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं दी जा सकती। राजनेताओं के बीज की बात तो आगे करुंगा, लेकिन यहां यह बताना जरूरी है कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने शिक्षक पद के लिए पात्रता परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक का नियम बना रखा है। यानि अभ्यर्थी के न्यूनतम 60 प्रतिशत अंक लाने ही होंगे। लेकिन राजनीतिक दखल के चलते अनुसूचित जाति ओर जनजाति वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम अंक 36 प्रतिशत कर दिए गए। लेकिन आदिवासी क्षेत्र के सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 60 प्रतिशत अंक लाने का ही नियम रखा।
जबकि आदिवासी क्षेत्र की भोगौलिक और सामाजिक परिस्थितियों में एससी और एसटी के लोग रहते हैं, उन्हीं परिस्थितियों में सामान्य वर्ग के लोग रहते हैं। रीट की 2018 की परीक्षा में 36 प्रतिशत अंक लाने पर भी एससी और एसटी के अभ्यर्थियों का चयन हो गया, लेकिन सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी 60 प्रतिशत अंक लाने में विफल रहे। यही वजह रही कि इस क्षेत्र के सामान्य वर्ग के 1167 पद खाली रह गए। यदि समान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को भी 36 प्रतिशत अंक वाली सुविधा मिल जाती तो यहां के सामान्य वर्ग के करीब युवा भी शिक्षक बन सकते थे। अब मांग की जा रही है कि खाली पड़े 1167 पदों पर 36 प्रतिशत वाले जनजाति के युवाओं को नियुक्ति दी जाए।
सवाल यह भी है कि क्या एससी-एसटी ओबीसी आदि वर्ग के आरक्षित वाली पदों पर 80 प्रतिशत अंक लाने वाले सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जा सकती है? इस सवाल का जवाब न में ही आएगा। जिस वर्ष एससी एसटी के पद रिक्त रह जाते हैं उन पदों को अगले वर्ष की परीक्षा में शामिल किया जाता है। लोकतंत्र में किसी की हिम्मत नहीं कि रिक्त पड़े आरक्षित पदों पर सामान्य वर्ग के युवा को नौकरी दे दी जाए।
जब रिक्त आरक्षित पद पर सामान्य वर्ग को नियुक्ति नहीं दी जा सकती है, तब सामान्य वर्ग के रिक्त पदों पर आरक्षित वर्ग को नियुक्ति देने की मांग कितनी जायज है? इस पर राजनेताओं को भी मंथन करना चाहिए। सवाल यह भी है कि जब आजादी के बाद से सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जा रहा है तो फिर इन क्षेत्रों के हालाता क्यों नहीं सुधरे? सरकार आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर करोड़ों रुपया प्रतिवर्ष खर्च करती है। यदि आज भी डूंगरपुर के आदिवासी क्षेत्र के लोग पिछड़े हुए हैं तो फिर कौन जिम्मेदार है?
राजनेताओं की भूमिका:
जानकार सूत्रों के अनुरूप वर्ष 2008 से 2013 में जब अशोक गहलोत प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब शिक्षा विभाग की कमान मास्टर भंवरलाल मेघवाल के पास थी। तब वर्ष 2012 में अजमेर स्थित माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने ही रीट की परीक्षा करवाई थी। तब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के नियमों को बदलते हुए एससी एसटी वर्ग के लिए 36 प्रतिशत अंक लाने वाले अभ्यर्थी को भी शिक्षक पद के लिए पात्र माना गया। यानि शिक्षक की योग्यता के मापदंड बदल दिए गए।
इसी प्रकार अब भाजपा सांसद किरोडीलाल मीणा भी डूंगरपुर के आंदोलन कारियों के साथ खड़े हो गए हैं। यानि वोटों के लिए राजनेता कुछ भी करने को तैयार है। इतना ही नहीं हाल में प्रदेश में हुई विधायकों की बाड़ााबंदी में भी डूंगरपुर क्षेत्र के चार पांच विधायक चर्चाओं में रहे। जब इस क्षेत्र के विधायक किसी सरकार को बचाए रखने में भूमिका निभाएंगे तो फिर ऐसे ही हिंसक आंदोलन देखने को मिलेंगे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे सामान्य वर्ग के पदों पर आरक्षित वर्ग को नियुक्ति देने के पक्ष में हैं।

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