- विकास के काम नहीं होने से भील प्रदेश की मांग को बल मिला तथा जय जौहार का नारा बुलंद हुआ।
- शिक्षकों के 1167 पदों पर जनजाति के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने की मांग तो बहाना है।
- मौजूदा हालातों के लिए भाजपा-कांग्रेस दोनों जिम्मेदार।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 26 सितम्बर को भी राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र डूंगरपुर में लगातार तीसरे दिन भी हालात तनावपूर्ण बने रहे। पिछले दो दिन से दर्जनों वाहनों में आग लगाई जा रही है। इनमें पुलिस के वाहन भी शामिल हैं। आदिवासियों की एकता के आगे पुलिस बल भी बेबस नजर आ रहा है।
इस क्षेत्र के हालात नाजुक बने हुए हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उपद्रवियों से सख्ती से निपटने के निर्देश दिए हैं। आंदोलन का मुख्य मुद्दा शिक्षकों के रिक्त पड़े 1167 पदों पर जनजाति के अभ्यर्थियों को नौकरी देने की मांग से जुड़ा है। सवाल उठता है कि क्या सिर्फ इसी मांग को लेकर इतना बड़ा और हिंसक आंदोलन हो गया? शिक्षकों के पद तो पिछले ढाई वर्ष से खाली पड़े हैं। आंदोलनकारी भी जानते हैं कि संविधान के अनुरूप रिक्त पदों पर सिर्फ जनजाति के अभ्यर्थियों की नियुक्ति नहीं हो सकती है। सवाल यह भी है कि अब भारतीय ट्रायबल पार्टी के दो विधायक राजकुमार रोत (चौरासी) और राम प्रसाद ढेढोर (सांगवाड़ा) मौजूदा कांग्रेस सरकार को समर्थ दे रहे हैं, तब हिंसक प्रदर्शन की क्या जरुरत थी? दोनों विधायक अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सीधे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बात कर सकते थे।
सबको पता है कि बीटीपी के ये दोनों विधायक जुलाई-अगस्त में एक माह तक होटलों में सीएम गहलोत के साथ रहे थे। तब गहलोत ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मेरे साथ रहने वाले विधायकों के नुकसान की भरपार्ई ब्याज सहित करुंगा। यानि सीएम गहलोत विधायकों की हर मांग मानने को तैयार थे। असल में शिक्षकों के रिक्त पद पर नियुक्ति की मांग तो एक बाहना है। असली वजह तो भील प्रदेश की मांग को बुलंद करना है। पिछले कई वर्षों से राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ आदि में आदिवासी परिवार नाम की संस्था सक्रिय हैं।
इसी संस्था ने राजस्थान की सीमा से लगे मध्यप्रदेश और गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों को मिलाकर भील प्रदेश बनाने की मांग रखी है, नक्सल प्रभावित छत्तसीगढ़ और झारखंड के कई आदिवासी नेता यहां सक्रिय रहे हैं, इसलिए झारखंड की तर्ज पर जय जौहार का नारा बुलंद किया गया। सब जानते हैं कि झारखंड और छत्तसीगढ़ में आदिवासियों को किस तरह हिन्दू समाज से अलग किया गया। राजस्थान का डूंगरपुर क्षेत्र भी उसी दिशा में जा रहा है। चूंकि राजनीतिक दलों ने आदिवासियों का इस्तेमाल सिर्फ वोट के खातिर किया और भ्रष्टाचार प्रशासनिक तंत्र ने सरकार का पैसा बीच में हड़प कर लिया, इसलिए आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं हुआ।
यदि समय रहते इन क्षेत्रों में विकास हो जाता तो आज डूंगरपुर में ऐसे हालात देखने को नहीं मिलते। राजनेता अब कुछ भी कहें, लेकिन भील प्रदेश की चाहत रखने वाले मजबूत स्थिति में खड़े हैं। राजस्थान के डूंगरपुर क्षेत्र में भी छत्तसीगढ़ की तर्ज पर पथलगढ़ी की व्यवस्था होने लगी है। इस व्यवस्था में सरकारी तंत्र की कोई भूमिका नहीं होती है। जब ऐसे हालात तेजी से पनप रहे हों, तब किसी समझौते की बात बेमानी है। अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार भले ही ताजा मामले में लीपापोती कर लें, लेकिन माहौल को सुधारना मुश्किल होगा। जय जौहार की अब एक ऐसी विचारधारा पनप चुकी है जो अपने नजरिए से ही काम करती है।
यदि बीटीपी के विधायक राजकुमार रोत व रामप्रसाद ढेढोर आंदोलनकारियों के साथ खड़े नहीं होंगे तो दोनों अपने निर्वाचन क्षेत्र में घुस नहीं सकते हैं। ताजा आंदोलन के जरिए आदिवासी परिवार ने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर दिया है। यदि अब भी आदिवासियों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया गया तो बूरे परिणाम भुगकतने होंगे। जहां तक भाजपा का सवाल है तो शुरू में माना गया कि आदिवासी परिवार की गतिविधियों से कांगे्रस को नुकसान होगा, लेकिन भाजपा का यह अनुमान गलत निकला। उल्टे आदिवासी लोग हिन्दू परंपरा से अलग हो गए। यदि भाजपा वोटों का लालच नहीं करती तो हालात इतने खराब नहीं होते।







