क्या पायलट फैक्टर के चलते सिम्बल वाले चुनाव करवाने से डर रही है राजस्थान की गहलोत सरकार ?

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  • 6 नगर निगमों के चुनाव टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर होगी एसएलपी।
  • पर निर्वाचन विभाग चुनाव करवाने को तैयार।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिया है कि जयपुर, जोधपुर और कोटा के छह नगर निगमों के चुनाव 31 अक्टूबर तक करवाए जाए। हाईकोर्ट के इस आदेश पर रोक लगवाने और चुनाव को टालने के लिए अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर कर रही है। अशोक गहलोत के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस सरकार का तर्क है कि इन दिनों प्रदेश में कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है, इसलिए चुनाव नहीं करवाए जा सकते। यह बात अलग है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य निर्वाचन विभाग भी 6 नगर निगमों के चुनाव 31 अक्टूबर तक करवाने को तैयार हो गया है। लेकिन गहलोत सरकार किसी भी स्थिति में उन चुनावों को टालना चाहती है, जो दलीय आधार पर होने हैं। 6 नगर निगम के वार्ड पार्षदों का चुनाव दलीय आधार पर होगा और फिर निर्वाचित पार्षद मेयर का चुनाव करेंगे। असल में गहलोत सरकार मौजूदा राजनीतिक हालातों में चुनाव चिन्ह (सिम्बल) वाले चुनाव करवाना ही नहीं चाहती। यदि कोरोना संक्रमण का डर होता तो प्रदेश में सरपंचों के बकाया चुनाव भी नहीं करवाए जाते। इन दिनों प्रदेश भर में सरपंचों के चुनाव हो रहे हैं। पहले चरण के चुनाव में अधिकांश मतदान केन्द्रों पर सामाजिक दूरी का कोई ख्याल नहीं रखा गया। सरपंच चुनाव के प्रचार के लिए भी गांव ढाणी में लगातार बैठकें हुई। चूंकि सरपंच का चुनाव राजनीतिक दल के सिम्बल पर होता है, इसलिए कोई भी दल निर्वाचित सरपंच पर अपना दावा कर सकता है। सरपंच के चुनाव से यह पता नहीं चहता कि किस दल की हार अथवा जीत हुई है। जबकि नगर निगम के चुनाव में साफ पता चलेगा कि सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी की जीत हुई है या हार। मौजूदा राजनीतिक माहौल में गहलोत सरकार सिम्बल वाले चुनाव करवाने से डर रही है। इसके पीछे पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट का राजनीतिक समीकरण बताया जा रहा है। पायलट को डिप्टी सीएम और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद पायलट समर्थकों में खासी नाराजगी है। यह नाराजगी अजमेर और जयपुर संभाग में हुई रायशुमारी के दौरान भी उजागर हो गई थी। गहलोत और पायलट समर्थकों में जो झगड़ा हुआ उसे देखते हुए शेष पांच संभागों में अभी तक भी रायशुमारी का काम शुरू नहीं हो सका है। पायलट को लेकर गुर्जर समुदाय में भी नाराजगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में गुर्जर समाज की सक्रिय भूमिका है। ऐसे राजनीतिक माहौल को देखते हुए ही पंचायतीराज के जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव भी पिछले छह माह से टाले जा रहे हैं। इन दोनों संस्थाओं के चुनाव भी दलीय आधार पर ही होंगे। जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य के चुनाव नहीं होने से प्रधान और जिला प्रमुख का चयन भी नहीं हो रहा है। शहरी क्षेत्र में सिर्फ 6 निगमों के चुनाव का सवाल नहीं है, बल्कि प्रदेश की 129 निकायों के चुनाव का भी है। 129 निकायों में पार्षदों, अध्यक्ष, सभापति और मेयर का कार्यकाल गत 20 अगस्त को ही समाप्त हो गया है। सरकार ने शहरी निकायों और पंचायत समितियों में अधिकारियों को ही जन प्रतिनिधियों के अधिकार दे रखे हैं। यदि छह निगमों के चुनाव होते हैं तो फिर सरकार पर 129 निकायों के चुनाव करवाने का दबाव भी होगा। मौजूदा राजनीतिक हालातों में गहलोत सरकार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। यही वजह है कि निगम चुनाव टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक से गुहार लगाई जा रही है।

 

 

 

 

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