वसुंधरा राजे से विवादों को टालते हुए डॉ. सतीश पूनिया ने राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष पद पर एक साल पूरा किया।

vasundhara raje and satish punia

अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को अपने ही जंजालों में उलझाए रखा।

 

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – 24 अक्टूबर को जयपुर में राजस्थान प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया का जन्म दिन उत्सााह से मनाया गया। घर और प्रदेश कार्यालय पहुँचकर प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं में डॉ. पूनिया को बधाई दी। जन्मदिन के साथ ही डॉ. पूनिया का प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर एक वर्ष का कार्यकाल भी पूरा हो रहा है। मदनलाल सैनी के निधन के बाद डॉ. पूनिया को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था। पूनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के साथ विवादों को टालने की थी। सब जानते हैं कि किन परिस्थितियों में सैनी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन डॉ. पूनिया के समय अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार स्थापित हो चुकी थी।

 

अध्यक्ष बनने के बाद पूनिया ने अपनी कार्यकारिणी भी बनाई और पूर्व सीएम राजे के समर्थकों का ख्याल भी रखा। पिछले एक वर्ष में डॉ. पूनिया ने अपनी राजनीतिक कुशलता दिखाते हुए वसुंधरा राजे से सभी विवादों को टाला। भाजपा के जिस प्रदेश कार्यालय में वसुंधरा राजे के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता था, उस कार्यालय में पूनिया ने अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवाई। हालांकि राजे की नाराजगी केन्द्रीय नेतृत्व से रही, लेकिन फिर भी पूनिया ने अपनी ओर से राजे का सम्मान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूनिया का प्रयास रहा कि उनके कार्यकाल में सभी कार्यकर्ताओं को सम्मान मिले। पूनिया ऐसे कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया, जिन्हें अभी तक भी मौका नहीं मिला था। हालांकि पूनिया का अधिकांश कार्यकाल कोरोना लॉकडाउन में ही गुजर गया। लेकिन फिर भी मंडल स्तर पर गतिविधियां करवाई गई। पूनिया ने भाजपा को किसी खास नेता के असर से बाहर निकाल कर कार्यकर्ताओं की पार्टी बनाने में कड़ी मेहनत की। अपने सरल और मधुर व्यवहार से पूनिया ने राजस्थान से बने केन्द्रीय मंत्रियों से भी तालमेल बनाए रखा। कहा जा सकता है कि आज राजस्थान भाजपा में कोई गुट बाजी नहीं है।

 

अपनी ही जंजालों में उलझाया:
सब जानते हैं कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार का नेतृत्व कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत कर रहे हैं। गहलोत के मुकाबले पूनिया का राजनीतिक अनुभव बहुत कम है। गहलोत तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन पूनिया ने गहलोत और उनकी सरकार को अपने ही जंजालों में उलझाए रखा। पहले राज्य सभा के चुनाव में भाजपा का एक अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में उतार कर कोई एक माह तक गहलोत सरकार को उलझाया। राज्यसभा के तीन सदस्यों के चुनाव में विधायकों की संख्या के अनुरूप कांग्रेस के दो और भाजपा का एक उम्मीदवार जीतना तय था, लेकिन पूनिया ने भाजपा के दो उम्मीदवार खड़े कर कांग्रेस की गुटबाजी को उजागर कर दिया।

 

यही वजह रही कि सीएम गहलोत को अपने समर्थक विधायकों को दस दिनों तक होटल में बंधक बना कर रखा पड़ा। जुलाई माह में जब प्रदेशाध्यक्ष और डिप्टी सीएम रहते हुए सचिन पायलट ने बगावत की तो सीएम गहलोत ने सीधे तौर पर सतीश पूनिया को जिम्मेदार ठहराया। गहलोत का कहना रहा कि सतीश पूनिया नए नए अध्यक्ष बने हैं, इसलिए भाजपा नेतृत्व को खुश करना चाहते हैं। गहलोत ने यहां तक आरोप लगाया कि पूनिया ने दिल्ली में पायलट के समर्थक विधायकों से मुलाकात भी की है। हालांकि ऐसे आरोपों का पूनिया ने खंडन किया। लेकिन गहलोत अपने आरोपों पर आज भी कायम है। गहलोत के ऐसे आरोपों से पूनिया का राजनीतिक कद ऊंचा ही हुआ। यानि पूनिया जैसे नेता ने गहलोत जैसे दिग्गज नेता के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को गिराने का प्रयास किया। सब जानते हैं कि पायलट की बगावत के कारण गहलोत को अपने सौ विधायकों को एक माह तक होटलों में बंधक रखना पड़ा था, हालांकि अब पायलट पुन: कांग्रेस के साथ खड़े हैं। लेकिन पायलट और गहलोत के विचार एक नहीं हुए हैं। सत्तारूढ़ दल में चल रही उठा पटक पर पूनिया की नजर बनी हुई है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस में दोबारा से बगावत हो सकती है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति में सतीश पूनिया का कद लगातार बढ़ रहा है।

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