साइलेंट वर्कर की भूमिका निभाई भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भूपेन्द्र यादव ने बिहार में।

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  • एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की उम्मीद पर खरे उतरे।
  • अब राजस्थान का प्रभारी बनाया जाना चाहिए भूपेन्द्र यादव को। भाजपा की गांठों को यादव ही खोल सकते हैं।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – बिहार के विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद 11 नवम्बर की रात को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। मोदी ने परिणाम पूर्व टीवी चैनलों पर सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन कहा कि अब भाजपा के साइलेंट वोटर का पता लगाया जा रहा है। असल में भाजपा का साइलेंट वोटर नारी शक्ति है। महिलाओं ने चुपचाप भाजपा को वोट दे दिया। यह सही है कि चैनलों के सर्वे में कांग्रेस और आरजेडी का पलड़ा भारी दिखाया था। लेकिन अंत में बिहार में भाजपा और जेडीयू गठबंधन की जीत हुई।

 

 

सब जानते हैं कि भाजपा की ओर से भूपेन्द्र यादव ही प्रभारी महासचिव रहे। यादव ने भाजपा के साइलेंट वर्कर की तरह पूरे चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की भी भूमिका रही, लेकिन सारा दारोमदार यादव पर ही था। यादव भाजपा उम्मीदवारों की रणनीति तो बनाई, साथ ही सहयोगी दल जेडीयू के उम्मीदवारों का भी ख्याल रखा। यह बात अलग रही कि जेडीयू के उम्मीदवारों को ज्यादा नुकसान चिराग पासवान की पार्टी के उम्मीदवारों से हुआ। 243 सीटों में से भाजपा ने 110 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए, इनमें से 73 की जीत हुई। जबकि जेडीयू ने 115 उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन मात्र 43 ही जीत पाए। अब भले ही नीतिश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाया जा रहा हो, लेकिन बिहार की सरकार में भाजपा का दबदबा रहेगा। सरकार के गठन में भी भूपेन्द्र यादव की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

 

 

आमतौर पर नेता अपने बयानों से चर्चा में रहते हैं, लेकिन यादव अपने काम से चर्चा में हैं। सबसे खास बात यह है कि यादव खामोशी के साथ अपना काम करते हैं। यादव आम तौर पर मीडिया से भी बचते हैं। कहा जा सकता है कि यादव एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। बिहार चुनाव के परिणाम के बाद भाजपा की शीर्ष राजनीति में भूपेन्द्र यादव का कद और बढ़ेगा। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी भूपेन्द्र यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद गुजरात चुनाव का प्रभारी भी यादव को बनाया गया। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी यादव ही प्रभारी महासचिव थे, लेकिन तब भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन आरजेडी और जेडीयू के गठबंधन वाली सरकार 15 महीने ही चल पाई। बाद में बिहार में भाजपा और जेडीयू के गठबंधन वाली सरकार बनी इसमें भी यादव की सक्रिय भूमिका रही।

 

राजस्थान में दी जानी चाहिए भूमिका:
सब जानते हैं कि वर्ष 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भूपेन्द्र यादव ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। तब भाजपा को 200 में से 162 सीटें मिली। भले ही यह चुनाव वसुंधरा राजे के नेतृत्व में लड़ा गया, लेकिन जीत की रणनीति यादव ने बनाई थी। मौजूदा समय में यादव ने अजमेर के राजकीय महाविद्यालय से ही पढ़ाई की है। यानि यादव का अजमेर से आत्मीय संबंध है। राज्यसभा सांसद के तौर पर यादव का अजमेर ही गृह जिला है। अपना वोट भी यादव अजमेर में ही डालते हैं। लेकिन इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि 2018 के विधानसभा में यादव की राजस्थान की राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं थी। यादव राजनीति में विवादों से दूर रहते हैं।

 

वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते हुए जब राजस्थान में यादव के स्वयं को फिट नहीं समझा तो चुपचाप राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गए। राजे से उलझने के बजाए यादव ने दिल्ली में बैठकर अपना राजनीतिक कद बढ़ा लिया। दो बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी आज वसुंधरा राजे भाजपा में किस स्थिति में है, यह सब जानते हैं जबकि यादव की मजबूत स्थिति किसी से छिपी नहीं है। राजस्थान की राजनीति में यह सही अवसर है, जब भूपेन्द्र यादव को सक्रिय किया जा सकता है। मौजूदा समय में तब राजे की कोई भूमिका नजर नहीं आ रही है, तब संगठन को मजबूत करने की दृष्टि से यादव को प्रभारी बनाया जा सकता है। जहां तक प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का सवाल है तो पूनिया का यादव के साथ जोरदार तालमेल होगा। यादव को राजस्थान का प्रभारी बनाया जाता है तो इसका असर कांग्रेस की राजनीति पर भी पड़ेगा। अभी सीएम अशोक गहलोत ही सरकार और कांग्रेस में सर्वेसर्वा है। गहलोत के नेतृत्व को भूपेन्द्र यादव जैसा राष्ट्रीय नेता ही चुनौती दे सकता है। राजस्थान के भाजपा नेताओं के बीच मनमुटाव की जो गांठें हैं उन्हें भी यादव ही खोल सकते हैं।

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