राजस्थान में अब अशोक गहलोत ही कांग्रेस के आला कमान। सचिन पायलट बहुत पीछे।

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मंत्रिमंडल में संतुलन बनाने के कयास लगाना मीडिया छोड़े। अब एक तरफा खेल है।

अजमेर (एस.पी.मित्तल) – 22 जनवरी को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस के उन वरिष्ठ नेताओं को फटकार लगाई जो संगठन में चुनाव की जल्दबाजी कर रहे हैं। गहलोत जानते थे कि चुनाव की मांग करने वालों में गुलाम नबी आजाद , आनंद शर्मा जैसे दिग्गज नेता शामिल हैं। लेकिन फिर भी गहलोत ने अपनी बात को दृढ़ता से रखा। इस पर आनंद शर्मा को अपनी ओर से सफाई भी देनी पड़ी।

आनंद शर्मा की सफाई पूरी तरह गहलोत के सामने आत्मसमर्पण था। गहलोत ने कांग्रेस में चुनाव के मुद्दे को खत्म कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव कब होंगे, यह सिर्फ अशोक गहलोत ही जानते हैं। चुनाव का मुद्दा खत्म होने से सबसे बड़ी राहत गांधी परिवार को ही मिली है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गांधी परिवार में गहलोत की हैसियत क्या है। यह कहा जा सकता है कि अब अशोक गहलोत ही गांधी परिवार के सबसे बड़े मददगार हैं। 22 जनवरी को दिन में गहलोत ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में गांधी परिवार का झंडा बुलंद कर दिया और शाम को केरल पहुंच गए। गांधी परिवार के एक ओर वफादार मंत्री वेणुगोपाल दिल्ली से चार्टर प्लेन लेकर जयपुर आए और गहलोत को लेकर केरल पहुंच गए।

वेणुगोपाल को गहलोत ने ही राजस्थान से राज्यसभा का सांसद बनवाया है। केरल में भी पश्चिम बंगाल के साथ ही विधानसभा के चुनाव होने हैं। गहलोत केरल के वरिष्ठ पर्यवेक्षक हैं और केरल से ही राहुल गांधी लोकसभा के सांसद हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को हराने के लिए कांग्रेस ने कम्युनिस्टों से हाथ मिलाया है, लेकिन केरल में कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ रणनीति बनाई जा रही है। चूंकि गहलोत मुख्यमंत्री के ओहदे पर हैं, इसलिए केरल में सरकार को गहलोत को सुविधाएं उपलब्ध करवानी पड़ेंगी। केरल चुनाव में गहलोत की भूमिका कांग्रेस के लिए मायने रखती हैं, इसलिए चार्टर प्लेन का इस्तेमाल हो रहा है। 13 जनवरी को केसी वेणुगोपाल ने अचानक जयपुर आकर सीएम गहलोत से मुलाकात की। इसके तीन दिन बाद गहलोत ने राज्यपाल कलराज मिश्र से मुलाकात की। मीडिया ने इन दोनों मुलाकातों को गहलोत मंत्रिमंडल के विस्तार से जोड़ दिया।

यहां तक कहा गया कि कांग्रेस हाईकमान से गहलोत को मंत्रिमंडल में संतुलन बनाने की हिदायत मिली है। यानि सचिन पायलट के समर्थकों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए। कुछ अखबारों में नए मंत्रियों के नाम भी छप गए, लेकिन अब मंत्रिमंडल विस्तार के कोई संकेत नहीं हैं। मंत्रिमंडल में संतुलन बनाने के जो लोग कयास लगा रहे हैं उन्हें अब यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि राजस्थान में अशोक गहलोत ही कांग्रेस के आला कमान हैं। दिल्ली में अब कांग्रेस का ऐसा कोई नेता नहीं रहा है जो अशोक गहलोत को निर्देश या सलाह दे सके। जहां तक पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट का सवाल है तो वे कांग्रेस के मौजूदा सिस्टम में बहुत पीछे रह गए हैं।

भले ही प्रदेश में पायलट का जनाधार हो, लेकिन संगठन और सरकार में तो गहलोत की ही चलेगी। राजनीतिक नियुक्तियों में भी पायलट समर्थकों को कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। 22 जनवरी को भी गहलोत ने अपने नजरिए से हाईकोर्ट के रिटायर जज जीके व्यास को राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष तथा रिटायर आईपीएस महेश गोयल को सदस्य नियुक्त करवाया है। इससे पहले राजस्थान लोक सेवा आयोग और सूचना आयोग में भी गहलोत ने अपने पसंदीदा लोगों को भरा है। यहां तक प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास की पत्नी तक को लोक सेवा आयोग का सदस्य बना दिया। कई मौकों पर सचिन पायलट अपना शक्ति परीक्षण करते हैं, लेकिन मौजूदा हालातों में पायलट की भीड़ को देखने वाला कोई नहीं है। पायलट के समर्थकों को फिलहाल अगले विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा। पायलट यदि कोई राह अलग पकड़ते हैं,तब बात अलग है।

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