राजनीति में गद्दार, मक्कार, धोखेबाज को भी गले लगाना पड़ता है, इसीलिए तो अच्छे लोग राजनीति में नहीं आते।

  • आखिर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के इस मेल मिलाप के क्या मायने हैं?
  • आखिर सचिन पायलट विधानसभा में क्या कहेंगे?

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – कई बार यह सवाल उठता है कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते? हर अभिभावक अपने बच्चे को आईएएस जैसी नौकरी या फिर किसी कंपनी में भेजने के इच्छुक रहते हैं। नेताओं को छोड़कर शायद ही कोई अभिभावक होगा जो अपने बच्चे को राजनीति के क्षेत्र में भेजे। बच्चों को राजनीति में नहीं भेजने के सवाल का जवाब राजस्थान के ताजा राजनीतिक घटना से निकाला जा सकता है। जिन सचिन पायलट के लिए सीएम अशोक गहलोत ने बीस दिन पहले गद्दार, मक्कार, धोखेबाज जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, उन्हीं सचिन पायलट को 13 अगस्त को गले लगाना पड़ा। इसे गहलोत की राजनीतिक मजबूरी ही कहा जाएगा कि इन अवगुणों वालों व्यक्ति को भी सार्वजनिक तौर पर गले लगाना पड़ा है। पायलट के प्रकरण में गहलोत की राजनीतिक मजबूरी समझी जा सकती है। पायलट की बगावत को गहलोत अभी भी भाजपा का षडय़ंत्र बता रहे हैं। सवाल उठता है जो पायलट भाजपा के साथ कांग्रेस की सरकार को गिरा रहे थे, उन्हीें पायलट को अब गले क्यों लगाया जा रहा है? यदि कांग्रेस हाईकमान ने पायलट को कांगे्रस के साथ खड़ा करने का एक तरफा निर्णय ले लिया था तो क्या गहलोत में ऐसे निर्णय का विरोध करने की हिम्मत नहीं थी? माना कि अब सचिन पायलट का रुतबा पहले जैसा नहीं होगा, लेकिन गहलोत को भी विपरीत परिस्थितियों का समना करना पड़ेगा। विधायकों की खरीद फरोख्त को लेकर गहलोत ने जो बयानबाजी की, उससे पीछे हटना पड़ेगा। कांग्रेस में तब बड़ी हास्यास्पद स्थिति होगी, जब पायलट की बगावत के पीछे गहलोत भाजपा की साजिश बताएंगे और सचिन पायलट इंकार करेंगे। कांग्रेस के साथ वापस खड़ा होने के बाद पायलट ने एक बार भी स्वीकार नहीं किया है कि उनके दिल्ली प्रवास में भाजपा की साजिश है। सवाल उठता है कि ऐसे में गहलोत अपने आरोपों को कैसे साबित करेंगे? गहलोत अभी भी कह रहे हैं कि पायलट गुट यदि वापस नहीं आता तो भी विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया जाता। गहलोत का यह बयान दर्शाता है कि अब पायलट और उनके समर्थक 18 विधयकों का कोई महत्व नहीं है। इस बात का पता इससे भी चलता है कि 13 अगस्त को कांग्रेस विधायक दल की बैठक के बाद गहलोत ने अपने समर्थक 100 विधायकों के साथ पायलट गुट के 18 विधायकों को नहीं रखा। बैठक के बाद होटल फेयरमोंट में गहलोत समर्थक विधायक ही पहुंचे। पायलट गुट के विधायकों को दूर रखने की रणनीति से भी समझा जा सकता है कि अशोक गहलोत के मन में कितना मलाल है। गहलोत अब सफलता का श्रेय पायलट को नहीं देना चाहते हैं। पायलट के रुतबे का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि विधानसभा में पायलट अब सीएम गहलोत के बराबर नहीं बैठेंगे। पायलट पहली बार के विधायक हैं, इसलिए उनकी सीट अब परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास के भी पीछे चली गई है। जो पायलट राजस्थान में दोबारा से कांग्रेस की सरकार बनने का श्रेय लेते थे उन पायलट की मौजूदा स्थिति भी राजनीति के चरित्र को उजागर करती है।
पायलट अब विधानसभा में क्या कहेंगे?:
14 अगस्त से शुरू हुए विधानसभा सत्र में सरकार के बहुमत परीक्षण की बहस में पायलट क्या कहेंगे, अब इस पर सबकी नजर है। 14 अगस्त के बाद वधिानसभा 17 अगस्त से शुरू होगी। क्योंकि 15 व 16 अगस्त को शनिवार और रविवार का अवकाश रहेगा। गहलोत के समर्थक भाजपा पर सरकार गिराने को लेकर जमकर हमला करेंगे, तब पायलट का संबोधन बहुत मायने रखेगा। पायलट किसी भी स्थिति में अपने दिल्ली प्रवास को भाजपा से नहीं जोड़ेंगे। पायलट का अभी भी यह कहना है कि विधानसभा चुनाव में जो वायदे किए थे वो गहलोत सरकार नेपूरे नहीं किए। यही बात कांग्रेस हाई कमान को बताने के लिए दिल्ली गए थे। हाई कमान ने हमारी बात सुन ली तो हम वापस जयुपर आ गए। यानि विधानसभा में भी पायलट अपने संबोधन में गहलोत के आरोपों से इंकार करेंगे। यानि इस बार विधानसभा में भी राजनीति का मनोरंजन देखने को मिलेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here