जब शराब और सब्जी की बिक्री हो सकती हैं, तब धर्म स्थलों पर प्रसाद चढ़ाने और घंटी बजाने पर रोक क्यों?

अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह में तो फूलों का ही खास महत्व है।

जयपूर (एस.पी.मित्तल) – कोरोना काल में ऐसे कई मौके आए हैं, जब राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने केन्द्र की गाइड लाइन मानने से इंकार कर दिया। तब कहा गया कि सरकार अपने राज्य की स्थिति को देखते हुए निर्णय लेगी। यही वजह रही कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिला कलेक्टरों को भी विशेष अधिकार दिए, ताकि वे अपने जिले की स्थिति को देखकर निर्णय ले लें। लेकिन धर्म स्थलों को लेकर राज्य सरकार केन्द्र की गाइड लाइन पर ही अमल करेगी। यानि आगामी सात सितम्बर से राजस्थान के धार्मिक स्थल तो खुल जाएंगे, लेकिन श्रद्धालु न तो प्रसाद चढ़ा सकेंगे और न घंटी बजा सकेंगे। सरकार का तर्क है कि प्रसाद की बिकी और फिर मंदिर में चढ़ाने की प्रक्रिया से कोरोना का संक्रमण बढ़ेगा। इसी प्रकार घंटी बजाने से भी कोरोना का संक्रमण बढ़ सकता है। सरकार ऐसे तर्क तब दे रही है जब अनलॉक में शराब और सब्जी की बिक्री की जा रही है। शराब की दुकानों पर दिन भर लाइन लगी रहती है, इसी प्रकार गली-कूचों तक में सब्जियां बिकी हैं। सरकार ने कई बार घोषणा की है कि सब्जी बेचने वालों का कोरोना टेस्ट करवाया जाएगा, लेकिन आज तक भी अभियान चला कर सब्जी विक्रेताओं का टेस्ट नहीं करवाया गया है। जबकि सरकार भी जानती है कि लॉकडाउन में बेरोजगार हुए सैंकड़ों लोग सब्जी बेचने के कार्य में लग गए हैं। शहरों में कई सब्जी मंडिया बन गई हैं। कोरोना के संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा शराब की दुकानों और सब्जी मंडियों में है। लेकिन सरकार को संक्रमण का खतरा धर्मस्थलों के बाहर नजर आ रहा है। जबकि सब जानते हैं कि धर्म स्थल बंद हो जाने से प्रसाद, फूल, माला आदि सामग्री बेचने वाले हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। मंदिर में लगी घंटी पर रोक का तुक तो नजर नहीं आता। सरकार में बैठे लोग बताएं कि घंटी बजने से संक्रमण कैसे होगा? शराब की दुकान और सब्जी मंडियों में तो साफ-सफाई का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है, जबकि धार्मिक स्थलों पर तो अनिवार्य तौर पर साफ-सफाई होती है। यहां तक धार्मिक स्थल पर प्रवेश से पहले जूते-चप्पल तक बाहर उतारे जाते हैं। प्रवेश करने वाला व्यक्ति भी स्नान करने के बाद ही आता है। पिछले पांच माह में आम व्यक्ति भी स्वच्छता और फिजीकल डिस्टेसिंग के प्रति जागरूक हो गया है। मंदिर-मस्जिद में प्रवेश से पहले हाथों को सेनेटाइज भी किया जा रहा है। सरकार को चाहिए कि लोगों की धार्मिक भावनाओं का ख्याल करते हुए धर्म स्थलों पर प्रसाद, फूल, माला चढ़ाने के साथ-साथ घंटी बजाने की भी छूट दे। यदि श्रद्धालु प्रसाद ही नहीं चढ़ा सकेंगे तो मंदिर जाने का क्या फायदा है। प्रसाद चढ़ेगा तो हजारों लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
दरगाह में तो फूलों का ही महत्व :
सरकार के निर्णय के बाद अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भी सात सितम्बर से जायरीन के लिए खुल जाएगी। मालूम हो कि दरगाह में गत 20 मार्च से ही जायरीन का प्रवेश बंद है। हालांकि अभी दरगाह में जायरीन के प्रवेश पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन माना जा रहा है कि खादिम समुदाय और सीमित संख्या में जायरीन को प्रवेश दिया जाएगा। दरगाह की परम्परा में मजार शरीफ पर फूल चढ़ाने का ही महत्व है। अधिकांश जायरीन फूलों की चादर मजार शरीफ पर पेश करते हैं। दरगाह में प्रसाद चढ़ाने की कोई परम्परा नहीं है, इसीलिए दरगाह के अंदर और बाहर सबसे ज्यादा फूलों की बिक्री ही होती है। फूलों की बिक्री से ही सैंकड़ों लोगों को रोजगार मिलता है।

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