- यौमे-ए-अशूरा पर मुसलमान न तो लहूलुहान हुए और न ही ताजिए का जुलूस निकाला।
- कोरोना संक्रमण की वजह से पांच माह से दरगाह में जायरीन का प्रवेश बंद है।
- पुलिस प्रशासन ने समझदारी से हालात नियंत्रण में किए। अंजुमन की भी सकारात्मक भूमिका।
जयपूर (एस.पी.मित्तल) – देश और दुनिया के मुसलमानों में अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के प्रति अकीदत है। यही वजह है कि यहां होने वाली छोटी घटना का भी अंतर्राष्ट्रीय महत्व है। पैगम्बर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की शाहदत की याद में मोहर्रम के अवसर पर अनेक धार्मिक रस्में होती है। दरगाह के खादिम समुदाय द्वारा ताजिए का जुलूस निकाला जाता है तो दरगाह के निकट अंदरकोट तथा तारागढ़ पर हाईदौस होता है। जुलूस में जहां हजारों मुसलमान शामिल होते हैं तो वहीं हाईदौस की रस्म में चमचमाती नई तलवारों से एक दूसरे को लहूलुहान किया जाता है। तारागढ़ पर अनेक लोग अपने हाथ में ब्लैड रख कर छाती को जख्मी कर लेते हैं। प्रशासन को ऐसे धार्मिक आयोजन की जानकारी होती है, इसलिए सरकारी अस्पताल में पहले से ही इलाज के प्रबंध होते हैं। लेकिन इस बार मोईरम में ऐसा माहौल और दृश्य देखने को नहीं मिले। जिला पुलिस अधीक्षक कुंवार राष्ट्रदीप ने आयोजन से जुड़ी संसाओं के प्रतिनिधियों को पहले ही बुलाकार समझाइश कर दी। बताया गया कि कोरोना संक्रमण की वजह से सरकार ने सभी प्रकार के धार्मिक आयोजनों पर रोक लगा रखी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि संस्थाओं के प्रतनिधियों ने भी आयोजन नहीं करने में सकारात्मक भूमिका निभाई। 20 अगस्त से लेकर 31 अगस्त तक ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे सरकार की गाइड लाइन का उल्लंघन होता हो। दरगाह के खादिमों की प्रतिनिधि संस्था अंजुमन सैय्यद जादगान के सचिव वाहिद हुसैन अंगाराशाह प्रशासन और खादिम समुदाय के बीच महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि कुछ खादिमों का कहना था कि मोहर्रम की रस्में मुसलमानों के जज्बातों से जुड़ी हुई है, जिनको कोई बदल (विकल्प) नहीं है। आजादी के बाद से ही दगरहा में ऐसी रस्में लगातार हो रही है। लेकिन पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप ने भी स्पष्ट कर दिया कि इस बार रस्म नहीं होंगी। एसपी का कहना रहा कि पुलिस की रुचि धार्मिक रस्मों पर रोक लगाने में नहीं है, बल्कि लोगों की जान बचाने में है। यदि ताजिए के जुलूस में शामिल हजारों लोग कोरोना संक्रमण के शिकार हो जाएंगे तो फिर हालात संभालना मुश्किल होगा। पुलिस की सख्ती आम लोगों के बीच में ही है। आजादी के बाद पहली बार जिस तरह अजमेर के दरगाह क्षेत्र में मोहर्रम की रस्में नहीं हुई, उससे एक बार ख्वाजा साहब की दरगाह से देश दुनिया में शांति का संदेश गया है। दरगाह की प्रतिनिधि संस्थाओं ने संदेश दिया कि हम सब देश के हालातों के साथ हैं। अन्य धार्मिक स्थलों के साथ ीह अजमेर की दरगाह भी गत 20 मार्च से ही बंद है। अनुमत खादिम ही दरगाह के अंदर धार्मिक रसूकात सम्पन्न करवाते हैं। जायरीन का प्रवेश पूरी तरह बंद है। अब नई गाइड लाइन में 7 सितम्बर से सीमित संख्या में जायरीन के प्रवेश पर विचार किया जा रहा है।







